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सुरेंद्र किशोर ने डॉ. स्वामी पर किया तीखा प्रहार, साझा किया 80 के दशक का किस्सा

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी पर तीखी टिप्पणी की है, जिसमें उन्होंने स्वामी के राजनीतिक भटकाव और उनके निजी जीवन में झांकने की आदत पर सवाल उठाए हैं। किशोर ने 80 के दशक का एक दिलचस्प किस्सा साझा किया, जिसमें उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार माइकल टी काफमैन के साथ बातचीत का जिक्र किया। इसके अलावा, उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी गंगा शरण सिन्हा के संस्मरणों का भी उल्लेख किया। किशोर ने स्वामी के जनहित कार्यों की सराहना करते हुए उन्हें सलाह दी कि वे अपने कार्यों को संस्थागत रूप दें।
 

सुरेंद्र किशोर का डॉ. स्वामी पर हमला


नई दिल्ली. वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी पर एक गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में स्वामी के राजनीतिक परिवर्तन पर तीखी टिप्पणी की। किशोर ने कहा कि जो स्वामी कभी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते थे, वे अब नेताओं की निजी जिंदगी में झांकने लगे हैं। यह उनके टूटे हुए सपनों का परिणाम है।

किशोर ने 80 के दशक का एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार माइकल टी काफमैन के साथ अपनी बातचीत का जिक्र किया। इसके साथ ही, उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी गंगा शरण सिन्हा का भी एक किस्सा सुनाया। किशोर का मानना है कि जनता नेताओं का मूल्यांकन उनके कार्यों के आधार पर करती है, न कि उनकी निजी जिंदगी के किस्सों से। यदि स्वामी अपनी जनहित याचिकाओं को संस्थागत रूप देते, तो देश का अधिक भला होता।

‘पीएम बनने के अवसर’ का किस्सा
सुरेंद्र किशोर ने बताया कि 80 के दशक में जब वह पटना के ‘आज’ अखबार में कार्यरत थे, तब जॉर्ज फर्नांडिस के कहने पर माइकल टी काफमैन उनसे मिलने आए थे। माइकल ने किशोर से पूछा कि बिहार में स्वामी का कितना समर्थन है। किशोर ने कहा कि उनका कोई खास जनाधार नहीं है। माइकल ने बताया कि स्वामी ने उनसे कहा था, ‘मुझे तुरंत भारत लौटना है। इंदिरा गांधी की स्थिति अस्थिर है। मेरे पीएम बनने के अच्छे अवसर हैं।’

‘बेडरूम में झांकने से नेता नहीं गिरते’
किशोर ने यह भी कहा कि आज स्वामी और मधु किश्वर मिलकर नेताओं पर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि बेडरूम में झांकने से किसी नेता को नुकसान होता, तो गांधी-नेहरू जैसे नेताओं का नाम लेने वाला कोई नहीं होता। जनता नेताओं को उनकी खूबियों और खामियों के आधार पर आंकती है।

गंगा बाबू का किस्सा
किशोर ने गंगा शरण सिन्हा का भी जिक्र किया, जो गांधी, नेहरू और लोहिया के करीबी थे। जब किसी ने उनसे पूछा कि वे अपने संस्मरण क्यों नहीं लिखते, तो उन्होंने कहा, ‘यदि मैं सच-सच लिख दूं, तो जिन्हें आप स्वर्गीय कहते हैं, उन्हें नारकीय कहने लगेंगे।’ इसलिए वे नेताओं की निजी जिंदगी पर कुछ नहीं लिखते थे।

स्वामी के जनहित कार्यों की सराहना
किशोर ने अंत में स्वामी के जनहित कार्यों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि वे स्वामी की जनहित याचिकाओं के बड़े प्रशंसक हैं, जो देश के लिए लाभकारी रही हैं। किशोर ने स्वामी को सलाह दी कि यदि वे अपने पीआईएल के कार्यों को संस्थागत रूप देते, तो यह देश की बड़ी सेवा होती।