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सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के मामले पर नई याचिका दायर

आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है, जिसमें एक पशु कल्याण संस्था ने अदालत के आदेश के गलत अर्थ निकालने की चिंता व्यक्त की है। संस्था ने स्पष्ट स्पष्टीकरण की मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश आवारा कुत्तों को मारने की अनुमति नहीं देता। याचिका में यह भी कहा गया है कि आक्रामक कुत्तों की परिभाषा स्पष्ट नहीं है, जिससे अवैध रूप से कुत्तों को मारने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
 

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में बहस

आवारा कुत्तों के मुद्दे पर देशभर में चल रही चर्चाओं के बीच यह मामला एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है। एक पशु कल्याण संगठन ने अदालत में नई याचिका प्रस्तुत की है, जिसमें चिंता व्यक्त की गई है कि हाल ही में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का गलत अर्थ निकाला जा रहा है।




जानकारी के अनुसार, "एनिमल्स आर पीपल टू" नामक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट स्पष्टीकरण की मांग की है कि अदालत का आदेश आवारा कुत्तों को बिना वजह मारने या हटाने की अनुमति नहीं देता है।




संस्थान ने अपनी याचिका में उल्लेख किया है कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के "आवारा कुत्तों को खत्म करने" संबंधी बयान और खालसा कॉलेज से कुत्तों को हटाने की खबरों के बाद स्थिति चिंताजनक हो गई है। संस्था का आरोप है कि कुछ स्थानों पर अदालत के आदेश को कानून से परे जाकर लागू करने का प्रयास किया जा रहा है।




यह ध्यान देने योग्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को एक आदेश में कहा था कि रेबीज से संक्रमित, लाइलाज बीमारी से ग्रसित या अत्यधिक आक्रामक कुत्तों के मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत इच्छामृत्यु दी जा सकती है।




यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने आवारा कुत्तों से संबंधित स्वतः संज्ञान मामले में दिया था। अदालत ने उस समय कहा था कि बच्चों और बुजुर्गों पर कुत्तों के हमलों की घटनाएं अत्यंत चिंताजनक हैं।




पिछले वर्ष भी सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने और सड़कों पर खुले में कुत्तों को खाना खिलाने पर रोक लगाने के निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि कुत्तों को केवल निर्धारित स्थानों पर ही भोजन दिया जा सकता है।




नई याचिका में संस्था ने कहा है कि पशु जन्म नियंत्रण नियम 2023 के तहत इच्छामृत्यु केवल सीमित परिस्थितियों में और निर्धारित सुरक्षा प्रक्रियाओं के साथ ही दी जा सकती है। संस्था का कहना है कि यदि नियमों का पालन नहीं किया गया तो यह अवैध होगा।




याचिका में यह भी कहा गया है कि "आक्रामक कुत्ते" की स्पष्ट परिभाषा नियमों में नहीं दी गई है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन सामान्य आवारा कुत्तों को भी मनमाने तरीके से खतरनाक घोषित कर सकता है, जिससे अवैध रूप से उन्हें मारने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।




संस्था ने मांग की है कि किसी भी कुत्ते को "आक्रामक" घोषित करने से पहले एक विशेष समिति की जांच अनिवार्य की जाए। इस समिति में सरकारी पशु चिकित्सक, मान्यता प्राप्त पशु कल्याण संस्था का प्रतिनिधि और स्थानीय प्रशासन का एक अधिकारी शामिल होना चाहिए।




इसके साथ ही संस्था ने सुप्रीम कोर्ट से देशभर के पुलिस महानिदेशकों को निर्देश देने की भी मांग की है ताकि अदालत के आदेश के नाम पर किसी भी कुत्ते को जहर देकर मारने या नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं रोकी जा सकें।




इस मामले में याचिका अधिवक्ता सुपांथा सिन्हा द्वारा तैयार की गई है और अधिवक्ता आदित्य जैन के माध्यम से दाखिल की गई है। अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में आगे सुनवाई होने की संभावना है।