सुप्रीम कोर्ट में SC/ST आरक्षण पर क्रीमी लेयर को बाहर करने की याचिका
सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण से क्रीमी लेयर को बाहर करने की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है। याचिका में तर्क दिया गया है कि SC और ST समुदायों में एक ऐसा वर्ग उभर आया है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुका है। इस मुद्दे पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, जिसमें कुछ लोग इसे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ एक कदम मानते हैं, जबकि अन्य इसे असमानता को बढ़ावा देने वाला मानते हैं। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
Jan 13, 2026, 19:56 IST
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर चर्चा
सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है, जिसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण से क्रीमी लेयर को बाहर करने की मांग की गई है। अदालत ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों से इस मुद्दे पर जवाब देने के लिए कहा है। इसका मतलब यह है कि यह मामला अब संवैधानिक जांच के दायरे में आ गया है। उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई याचिका का मुख्य तर्क यह है कि SC और ST समुदायों के भीतर एक ऐसा वर्ग उभर आया है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुका है। यह वर्ग सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा और सत्ता के ढांचे में आरक्षण का लाभ उठा रहा है, जबकि वास्तव में हाशिये पर खड़े लोग पीछे रह जाते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि आरक्षण का उद्देश्य पीढ़ी दर पीढ़ी लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय से मुक्ति दिलाना था। यदि कोई परिवार पहले ही इस अन्याय से काफी हद तक मुक्त हो चुका है, तो उसे उसी श्रेणी में बनाए रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है。
याचिका में उठाए गए सवाल
याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा को स्वीकार किया गया है, तो SC और ST के मामले में इससे क्यों बचा जाए? संविधान समानता की बात करता है, और समानता का अर्थ यह नहीं है कि असमान परिस्थितियों को नजरअंदाज किया जाए।
विरोध और समर्थन की आवाजें
इस याचिका के सामने आते ही इसके समर्थन और विरोध में प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। एक पक्ष का मानना है कि आर्थिक या पदगत उन्नति के बावजूद सामाजिक भेदभाव समाप्त नहीं हुआ है। आज भी भेदभाव, अपमान और बहिष्कार की घटनाएं होती हैं। ऐसे में केवल आय या पद के आधार पर किसी को क्रीमी लेयर में डालना सामाजिक सच्चाई को नजरअंदाज करना होगा। उनका कहना है कि SC और ST का आरक्षण केवल गरीबी का मुद्दा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उत्पीड़न का प्रतिकार है।
आरक्षण की सीमाएं
हालांकि, यह भी सच है कि आरक्षण का लाभ कई बार एक सीमित वर्ग तक ही सीमित रह गया है। गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले सबसे कमजोर परिवार अब भी शिक्षा और अवसरों से वंचित हैं। उनके लिए आरक्षण एक कागजी वादा बनता जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या व्यवस्था को अधिक लक्षित और न्यायपूर्ण बनाने का समय नहीं आ गया?
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
अब यह मामला केवल अदालत के फैसले तक सीमित नहीं रह सकता। इसका प्रभाव राजनीति, समाज और नीति निर्माण पर पड़ेगा। यदि SC और ST आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू की जाती है, तो यह एक महत्वपूर्ण बदलाव होगा। यह बदलाव संवेदनशील और विवादास्पद भी हो सकता है, क्योंकि इससे समुदाय के भीतर नई रेखाएं खींची जा सकती हैं।
संवेदनशीलता और संतुलन
कुल मिलाकर, यह बहस टालने की नहीं, बल्कि परिपक्वता से संभालने की है। यदि आरक्षण अपने मूल उद्देश्य से भटक रहा है, तो उस पर सवाल उठाना लोकतंत्र की ताकत है। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि सुधार के नाम पर किसी भी समुदाय की पीड़ा और ऐतिहासिक अनुभव को हल्के में न लिया जाए। संतुलन यही है कि सबसे कमजोर को प्राथमिकता मिले।