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सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता पर की महत्वपूर्ण चर्चा

सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता (UCC) पर महत्वपूर्ण चर्चा की, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के भेदभावपूर्ण प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि UCC एक संवैधानिक आकांक्षा है और इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने बताया कि मौजूदा विरासत नियम महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं। अदालत ने इस मामले में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। यह सुनवाई महिलाओं के अधिकारों और समानता के मुद्दों पर महत्वपूर्ण है।
 

समान नागरिक संहिता की संवैधानिक महत्वता


नई दिल्ली। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह तर्क किया जा सकता है कि यह व्यक्तिगत कानून का मामला है। इस पर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने उत्तर दिया कि व्यक्तिगत कानून संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत सुरक्षा नहीं प्राप्त करते। यदि ये भेदभावपूर्ण हैं, तो इन्हें रद्द किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) एक संवैधानिक आकांक्षा है और इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा विपुल एम. पंचोली की पीठ ने केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। पीठ उस याचिका पर विचार कर रही है जिसमें कहा गया है कि शरीयत के मौजूदा विरासत नियम महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण हैं और इन्हें रद्द किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक आकांक्षा है और इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी तब की जब अधिवक्ता भूषण ने कहा कि यदि कोर्ट शरीयत कानून के प्रावधानों को रद्द करता है, तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू किया जा सकता है। इस पर सीजेआई ने कहा कि कोई यह तर्क दे सकता है कि यह व्यक्तिगत कानून का मामला है। भूषण ने फिर कहा कि व्यक्तिगत कानून संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत सुरक्षा नहीं प्राप्त करते। यदि ये भेदभावपूर्ण हैं, तो इन्हें रद्द किया जाना चाहिए। यदि इन्हें रद्द किया जाता है, तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो सकता है।

मुस्लिम उत्तराधिकार कानून केवल संहिताबद्ध नहीं है। इसके नियम इतने जटिल हैं कि वकीलों को भी इन्हें समझने में कठिनाई होती है। मैं अक्सर अपने मुस्लिम मित्रों से कहता हूं कि वे समान नागरिक संहिता का विरोध न करें। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी पर सहमति जताते हुए जस्टिस बागची ने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम के मामले में एकरूपता की दिशा में यह एक कदम है। उन्होंने भूषण से पूछा कि क्या यह कोर्ट के हस्तक्षेप का मामला है या इसे विधायिका पर छोड़ दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट पौलोमी पाविनी शुक्ला और न्याय नारी फाउंडेशन द्वारा दाखिल याचिका पर विचार कर रही है।

अधिवक्ता भूषण ने कहा कि अदालत भेदभावपूर्ण प्रथाएं रद्द कर सकती है। यह कहना कि महिलाओं को अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलेगा, भेदभावपूर्ण है। यह एक दीवानी मामला है, न कि अनुच्छेद-25 के तहत कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा।

वसीयत के मामले में भी, कोई मुस्लिम अपनी संपत्ति के 1/3 हिस्से से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता। इस प्रकार, मुस्लिम अपनी कमाई हुई संपत्ति के लिए भी अपनी मर्जी के अनुसार वसीयत नहीं कर सकते।

अदालत ने कहा कि शरीयत कानून के तहत भेदभाव की शिकार महिला को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। इस पर भूषण ने कहा कि याचिकाकर्ता संस्था का प्रतिनिधित्व एक मुस्लिम महिला कर रही है और उनके वकील भी एक मुस्लिम हैं। पिछली सुनवाई के बाद कई मुस्लिमों ने अर्जी के समर्थन में बयान जारी किए थे। सीजेआई ने भूषण से कहा कि कुछ ऐसे लोगों को ढूंढें जो सचमुच पीड़ित हों, ताकि भविष्य में मुद्दा न उठे।

भूषण ने पीठ से कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के तहत मौजूदा विरासत नियम महिलाओं के साथ स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि इन नियमों के तहत अक्सर महिलाओं को उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा दिया जाता है। यह एक्ट संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।