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सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज की, चुनाव प्रक्रिया में दखल नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए नामांकन रद्द करने के खिलाफ चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता और नटराजन को केवल चुनाव याचिका दायर करने का विकल्प है। रिटर्निंग ऑफिसर ने नटराजन का नामांकन इसलिए खारिज किया क्योंकि उन्होंने अधूरा हलफनामा प्रस्तुत किया था। जानें इस मामले में और क्या हुआ और नटराजन के वकील ने क्या तर्क दिए।
 

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

शुक्रवार को, सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन द्वारा मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए नामांकन रद्द करने के खिलाफ दायर याचिका को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता और नटराजन को केवल चुनाव याचिका दायर करने का विकल्प है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि चुनाव के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं है, और नटराजन की इस संदर्भ में अपील को खारिज कर दिया।


कोर्ट ने यह भी बताया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने नटराजन का नामांकन इसलिए खारिज किया था क्योंकि उन्होंने अधूरा 'फॉर्म 26' हलफनामा प्रस्तुत किया था और लंबित शिकायतों की जानकारी नहीं दी थी।


रिटर्निंग ऑफिसर का आदेश

रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश में यह भी उल्लेख था कि नटराजन ने शिकायत की प्रक्रिया में लिखित दलीलें दी थीं, जिससे उन्हें मामले की जानकारी थी। बेंच ने यह भी देखा कि नटराजन ने रिटर्निंग ऑफिसर के निर्णय के खिलाफ चुनाव आयोग से संपर्क किया था और अपनी बात लिखित में रखी थी। उन्होंने 10 जून को चुनाव आयोग के समक्ष अपना पक्ष भी प्रस्तुत किया, लेकिन उनकी याचिका पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।


नटराजन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क किया कि संविधान के अनुच्छेद 329(b) के तहत रोक लागू नहीं होती, क्योंकि याचिका का उद्देश्य निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करना था।


वकील का तर्क

सिंघवी ने यह भी कहा कि नामांकन को खारिज करना स्पष्ट रूप से अवैध था, क्योंकि जिस शिकायत के आधार पर विवाद उत्पन्न हुआ, उसमें न तो मामले का संज्ञान लिया गया और न ही आरोप तय किए गए। उन्होंने मोहिंदर सिंह गिल और अशोक कुमार जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि संवैधानिक अदालतें विशेष परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर सकती हैं, बशर्ते ऐसा हस्तक्षेप चुनावी प्रक्रिया में मदद करे।


चुनाव आयोग और अन्य प्रतिवादियों ने इस याचिका का विरोध किया, यह कहते हुए कि चुनाव लड़ने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और नामांकन रद्द होने पर केवल चुनाव याचिका के माध्यम से ही उपाय उपलब्ध है।