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सुप्रीम कोर्ट ने गाज़ियाबाद के डॉक्टर और अस्पताल को दी कड़ी फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने गाज़ियाबाद के एक आयुर्वेदिक डॉक्टर और अस्पताल को एक चार साल की रेप पीड़िता को चिकित्सा सहायता न देने के लिए कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या बच्ची को उसके गरीब परिवार से होने के कारण नजरअंदाज किया गया। मुख्य न्यायाधीश ने चिकित्सक की संवेदनशीलता पर सवाल उठाते हुए उन्हें पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का निर्देश दिया। जानें इस मामले में और क्या हुआ और अदालत ने क्या कहा।
 

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गाज़ियाबाद के एक निजी आयुर्वेदिक चिकित्सक और अस्पताल को गंभीर चेतावनी दी है। उन पर आरोप है कि उन्होंने एक चार साल की बच्ची, जो रेप का शिकार हुई थी, को आवश्यक चिकित्सा सहायता नहीं प्रदान की। न्यायालय ने यह सवाल उठाया कि क्या बच्ची को उसके गरीब परिवार से होने के कारण नजरअंदाज किया गया। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की तीन सदस्यीय बेंच ने चिकित्सक और अस्पताल की संवेदनशीलता पर सवाल उठाते हुए उन्हें पीड़ित परिवार को मुआवजा देने पर विचार करने का निर्देश दिया। CJI ने चिकित्सक के 'डॉक्टर' के पद का उपयोग करने के अधिकार पर भी सवाल उठाया, यदि वह अपनी मूल जिम्मेदारियों को निभाने में असफल है।


बेंच की कड़ी टिप्पणी

लाइव-लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, बेंच ने कहा, "यदि आप अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं, तो आपको अपने नाम के साथ 'डॉक्टर' लिखने का कोई अधिकार नहीं है! यदि आपमें संवेदनशीलता होती, तो आप बच्चे को दूसरे अस्पताल ले जाते, भले ही आपकी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। क्या आपने उसे नजरअंदाज किया क्योंकि वह गरीब थी और आपकी फीस नहीं चुका सकती थी?" सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसे बच्चे के पिता ने दायर किया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि इस साल मार्च में हुई घटना के बाद जांच और चिकित्सा सहायता में गंभीर कमी रही। बेंच ने आयुर्वेदिक चिकित्सक को भी फटकार लगाई, क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने बच्ची को प्रारंभिक चिकित्सा सहायता देने से मना कर दिया था।


अस्पताल की आलोचना

मुख्य न्यायाधीश ने चिकित्सक से कहा, "एक बच्चा आपके सामने लाया गया और आप इतने निर्दयी थे कि आपने उसे चिकित्सा सहायता नहीं दी। यदि आपमें थोड़ी भी संवेदनशीलता होती, तो आप उसे स्वयं अस्पताल ले जाते।" बेंच ने उस निजी अस्पताल की भी कड़ी आलोचना की, जहां बच्ची को ले जाया गया था। कोर्ट ने कहा कि अस्पताल का व्यवहार "अत्यंत निर्दयी" था।