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सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक समुदाय को पूजा-पाठ में स्वायत्तता है, लेकिन यदि यह धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को प्रभावित करता है, तो सरकार हस्तक्षेप कर सकती है। इस निर्णय का प्रभाव केरल के सबरीमाला मंदिर जैसे मामलों पर भी पड़ेगा। जानें इस निर्णय के पीछे की पूरी कहानी और इसके संभावित परिणाम।
 

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि धार्मिक गतिविधियों के बहाने सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि किसी भी धार्मिक समुदाय को अपने पूजा-पाठ के तरीके में स्वतंत्रता है, लेकिन यदि यह किसी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि को प्रभावित करता है, तो सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।

केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी की। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और अन्य न्यायाधीश शामिल थे।

सुनवाई के दौरान, हिंदू धर्म आचार्य सभा का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता अक्षय नागराजन ने दलील दी कि सरकार अनुच्छेद 25(2)(क) के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

संविधान के अनुच्छेद 25(2)(क) के अनुसार, राज्य को धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी किसी भी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि को विनियमित करने का अधिकार है। नागराजन ने कहा कि अनुच्छेद 25 का संरक्षण केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आस्था की बाहरी अभिव्यक्तियाँ भी शामिल हैं।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि धार्मिक गतिविधियाँ किसी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि को प्रभावित करती हैं, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वार्षिक उत्सव के दौरान मंदिर के आसपास की सड़कों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा, “आप अपनी धार्मिक गतिविधि कर सकते हैं, लेकिन सड़कों को अवरुद्ध करके नहीं। राज्य नियमन के लिए हस्तक्षेप कर सकता है।” न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत किसी धार्मिक समुदाय के मामलों में निर्णय नहीं दे सकती, लेकिन जब धर्मनिरपेक्ष गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।