सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अविवाहित रिश्तों पर चरित्र का सवाल नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने रिश्तों को किसी के चरित्र पर सवाल उठाने का आधार नहीं माना है। यह निर्णय एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का संकेत है, जो सरकारी भर्ती से जुड़े मामलों में भी प्रभाव डालेगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी से पहले के रिश्ते आज की वास्तविकता हैं और इन्हें नैतिक पतन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस फैसले ने न केवल एक पुलिस भर्ती को राहत दी है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सहमति के महत्व को भी उजागर करता है।
Jun 9, 2026, 12:09 IST
अविवाहित रिश्तों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
क्या दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने रिश्ते को किसी के चरित्र पर सवाल उठाने का आधार माना जा सकता है? क्या बिना विवाह के समाप्त होने वाले रिश्ते को धोखा माना जा सकता है? इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर भारत की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से 'नहीं' में दिया है। सरकारी भर्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिसका प्रभाव कानून, समाज और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पड़ेगा। जब समाज में शादी से पहले के रिश्तों को अक्सर रूढ़िवादी दृष्टिकोण से देखा जाता है, तब सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को किसी के चरित्र का मापदंड नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि किसी रिश्ते के टूटने के कारण गलत आक्षेप लगाने की प्रवृत्ति को रोकना चाहिए।
महत्वपूर्ण संदेश
जस्टिस मनमोहन और मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा, "दो वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को उस रिश्ते में शामिल व्यक्ति के चरित्र के बारे में गलत धारणा बनाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। ऐसा कोई कानून नहीं है जो वयस्कों को अपनी पसंद का रिश्ता बनाने से रोकता हो।" यह जानकारी एक मीडिया चैनल ने दी है।
एक विशेष मामला
यह निर्णय तेलंगाना के पुलिस कॉन्स्टेबल भर्ती उम्मीदवार गजूला थिरुपति के मामले में आया, जिनका चयन एक दशक पहले एक पड़ोसी के साथ रिश्ते के कारण रद्द कर दिया गया था। हालांकि, यह फैसला केवल यह तय करने से कहीं अधिक था कि कोई उम्मीदवार सरकारी नौकरी के लिए योग्य है या नहीं।
समाज में बदलाव
कोर्ट ने स्वीकार किया कि सामाजिक सच्चाई बदल गई है और अधिकारियों को इन परिवर्तनों को ध्यान में रखना चाहिए। बेंच ने कहा कि शादी से पहले के रिश्ते आज के समाज की वास्तविकता हैं और संस्थानों को पुरानी सोच पर आधारित कठोर धारणाओं से बाहर निकलना चाहिए।
समझौते का महत्व
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लोक अदालत में हुए समझौते का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति ने अपराध स्वीकार कर लिया है। जजों ने कहा कि यदि कोई सबूत होता कि शिकायतकर्ता को समझौते के लिए मजबूर किया गया था, तो अधिकारियों का उम्मीदवार की उपयुक्तता की जांच करना उचित होता।
निष्कर्ष
इस निर्णय का महत्व केवल एक पुलिस भर्ती को मिली राहत में नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संदेश भी देता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह दर्शाता है कि वयस्कों के बीच सहमति से बने रिश्तों और आपराधिक व्यवहार के बीच अंतर होना चाहिए।