सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: AI द्वारा निर्मित फर्जी कानूनी उदाहरणों को किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
भारतीय न्यायिक प्रणाली में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी निर्णय सामने आया है। सर्वोच्च न्यायालय ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा उत्पन्न फर्जी कानूनी उदाहरणों के आधार पर दिए गए ट्रिब्यूनल के आदेशों को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अदालत ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के निर्णयों को खारिज करते हुए 'AI हैलुसिनेशन' से उत्पन्न गंभीर खतरों पर चेतावनी दी है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति न्यायिक कार्यवाही और वकालत में AI के बढ़ते उपयोग से उत्पन्न चुनौतियों का अध्ययन करेगी।
कानूनी विवाद का सारांश
यह मामला जम्मू एंड कश्मीर बैंक लिमिटेड द्वारा इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 7 के तहत एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड (EIL) के खिलाफ दिवालियापन कार्यवाही से संबंधित है। EIL ने पैन इंडिया यूटिलिटीज डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड को दी गई क्रेडिट सुविधाओं के लिए कॉर्पोरेट गारंटी दी थी। NCLT मुंबई ने 28 अगस्त 2024 को 87.43 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट का संज्ञान लेते हुए दिवालियापन की याचिका को स्वीकार किया था, जिसे बाद में 11 सितंबर 2025 को NCLAT ने भी बरकरार रखा।
AI की 'मनगढ़ंत' थ्योरी का खुलासा
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, सस्पेंड की गई डायरेक्टर पूजा रमेश सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने अदालत को बताया कि ट्रिब्यूनल ने अपने निर्णय का आधार बनाने के लिए छह ऐसे न्यायिक फैसलों का सहारा लिया था जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं हैं।
इन कथित मिसालों में शामिल थे: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम श्री राम अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर (2020), एवरेस्ट केंटो सिलेंडर्स बनाम भारत संघ (2015), और ICICI बैंक बनाम अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर रियल एस्टेट (2019)। जब इन मामलों की गहन जांच की गई, तो यह पुष्टि हुई कि ये मामले किसी भी प्रामाणिक कानूनी डेटाबेस में नहीं थे।
AI हैलुसिनेशन का खतरनाक प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने न्याय प्रणाली में AI के अनियंत्रित उपयोग की तुलना एक भीषण त्रासदी से करते हुए कहा, "AI का यह परिणाम— नकली, गैर-मौजूद और काल्पनिक सामग्री बनाना— कानून और न्याय के क्षेत्र में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव जैसा है। यह अदृश्य रूप से खतरनाक है और जब तक किसी को इसका पता चलता है, तब तक यह पूरी व्यवस्था के लिए विनाशकारी हो चुका होता है।"
अदालत ने स्पष्ट किया कि AI सिस्टम में प्रॉम्प्ट का जवाब देते समय ऐसी नकली जानकारी उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है।
भविष्य की न्यायिक प्रक्रिया
अदालत ने यह भी कहा कि यह मामला केवल एक गलत फैसले को सुधारने का नहीं था, बल्कि भविष्य के लिए न्यायपालिका का दृष्टिकोण तय करने का एक बड़ा अवसर था। बेंच ने जोर देकर कहा कि भले ही AI जजों और वकीलों की शोध में मदद कर सकता है, लेकिन यह कभी भी इंसानी विवेक और सोच-समझ की जगह नहीं ले सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के फैसलों को पूरी तरह रद्द कर दिया है और इस मामले को बिना किसी AI-जनरेटेड फर्जी उदाहरणों के सहारे, केवल वास्तविक कानूनी तथ्यों के आधार पर नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस NCLT को भेज दिया है।