सुप्रीम कोर्ट का आदेश: शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हिरासत पर रोक, मेट्रो और इंटरनेट सेवाएं सामान्य रहेंगी
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों को केवल कानूनी प्रक्रिया के तहत ही हिरासत में लिया जा सकता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि दिल्ली में मेट्रो और रेलवे सेवाएं सामान्य रूप से चलें, इंटरनेट कनेक्टिविटी में कोई बाधा न आए, और लोगों की आवाजाही को सुगम बनाया जाए।
अधिकारियों को निर्देश
अदालत ने अधिकारियों को सर्वोच्च न्यायालय और अन्य अदालत परिसरों के आसपास लागू निषेधाज्ञा को हटाने का आदेश दिया, ताकि न्याय तक पहुंच में कोई रुकावट न आए।
यह आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शनिवार को हुए विरोध प्रदर्शन से पहले बड़े पैमाने पर हिरासत और आवाजाही पर प्रतिबंध के आरोपों पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
सुरक्षा बलों की कार्रवाई
शनिवार को लगभग 41,000 सुरक्षाकर्मियों ने राजधानी को एक किले में तब्दील कर दिया था और 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलें, जब तक कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत कानून व्यवस्था की स्थिति से निपटने के लिए पाबंदियां आवश्यक न हों।
अवमानना कार्यवाही
कोर्ट ने 9 अक्टूबर के आदेश का पालन न करने के आरोपों पर दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन, रेलवे अधिकारियों और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे अवमानना याचिकाओं के जवाब में संक्षिप्त हलफनामे दायर करें और मेट्रो/रेल सेवाओं के संचालन के संबंध में उठाए गए कदमों का विवरण प्रस्तुत करें।
सॉलिसिटर जनरल का बयान
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि शनिवार को मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चली थीं, हालांकि कुछ स्टेशनों पर प्रवेश और निकास प्रतिबंधित था।
पीठ ने प्रभावित स्टेशनों का विवरण मांगा और अधिकारियों को मंगलवार तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
विरोध का अधिकार
सुनवाई के दौरान, पीठ ने विरोध के अधिकार के दायरे पर चर्चा की। वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने कहा कि अनुच्छेद 19(1) के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि ये अधिकार अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं।
अगली सुनवाई
अदालत ने कहा कि अधिकारियों को हिरासत के तीन पहलुओं पर संतुष्ट करना होगा- किन परिस्थितियों में हिरासत में लिया गया, हिरासत किस तरीके से की गई, और इसका औचित्य क्या था।
मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को होगी।