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साइबर ठगी का नया तरीका: 'डिजिटल अरेस्ट' से सावधान रहें

साइबर अपराधियों ने 'डिजिटल अरेस्ट' नामक एक नया ठगी का तरीका अपनाया है, जिसमें वे पीड़ितों को डराकर पैसे ऐंठते हैं। इस प्रक्रिया में ठग खुद को पुलिस या अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर फर्जी कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं। एक महिला डॉक्टर के मामले में 17.8 करोड़ रुपये की ठगी का दावा किया गया है। जानें इस ठगी से कैसे बचें और क्या कदम उठाने चाहिए।
 

साइबर ठगी का नया तरीका


साइबर अपराधियों ने लोगों को डराने के लिए एक नया तरीका अपनाया है, जिसे 'डिजिटल अरेस्ट' कहा जाता है। इस प्रकार के मामलों में ठग खुद को पुलिस, सीबीआई, कस्टम या अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ितों को फर्जी कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, 'आपके नाम से पार्सल मिला है जिसमें ड्रग्स या अन्य प्रतिबंधित सामान है' जैसी कहानियाँ सुनाई जाती हैं। पुलिस के दस्तावेजों में ऐसे मामलों के कई उदाहरण दर्ज हैं।


पार्सल के डराने वाले फोन का मामला

एक महिला डॉक्टर को फोन पर बताया गया कि उनके नाम से भेजे गए पार्सल में ड्रग्स और अन्य आपत्तिजनक सामान है। जब महिला ने पार्सल भेजने से इनकार किया, तो ठगों ने मामले को और गंभीर बताते हुए उनके पहचान दस्तावेजों के दुरुपयोग का हवाला दिया।


इस प्रकार के फ्रॉड में कॉल को साइबर क्राइम, पुलिस या किसी केंद्रीय जांच एजेंसी के अधिकारी से जोड़ दिया जाता है। पीड़ित को विश्वास दिलाने के लिए फर्जी आईडी कार्ड, दस्तावेज और वीडियो कॉल का सहारा लिया जाता है। इंदौर पुलिस द्वारा दर्ज एक मामले में ठगों ने डॉक्टर को पार्सल में MDMA, पासपोर्ट और अन्य सामान होने की बात कहकर फर्जी अधिकारियों से कॉल ट्रांसफर किया।


वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट'

पीड़ित को वीडियो कॉल पर बने रहने के लिए कहा जाता है। ठग दावा करते हैं कि जांच पूरी होने तक फोन बंद नहीं किया जा सकता और किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क करने पर कार्रवाई हो सकती है। इस प्रकार पीड़ित को मानसिक दबाव में रखा जाता है।


पुलिस के अनुसार, 'डिजिटल अरेस्ट' वास्तव में कोई कानूनी गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला ठगी का तरीका है।


पैसे ट्रांसफर कराने का खेल

इसके बाद ठग पीड़ित से बैंक खाते की जानकारी और बैलेंस हासिल करने की कोशिश करते हैं। कई मामलों में कहा जाता है कि खाते में मौजूद रकम की जांच की जाएगी या 'वेरिफिकेशन' के बाद पैसा वापस कर दिया जाएगा।


इंदौर पुलिस के एक मामले में ठगों ने डॉक्टर से कथित मनी लॉन्ड्रिंग जांच के नाम पर पैसे एक खाते में ट्रांसफर करवाए थे। पुलिस ने बताया कि शिकायत के बाद मामले की जांच की गई और इसे ऑनलाइन फ्रॉड का मामला माना गया।


17.8 करोड़ की ठगी का दावा

एक मामले में 17.8 करोड़ रुपये की ठगी और 30 दिन तक डिजिटल अरेस्ट किए जाने का दावा किया गया है। हालांकि, इस मामले की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है। इसलिए इस रकम और अवधि को रिपोर्ट के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना उचित है।


डरने की जरूरत नहीं

पुलिस के अनुसार, 'पार्सल में ड्रग्स', 'मनी लॉन्ड्रिंग', 'गिरफ्तारी वारंट' जैसे शब्दों का इस्तेमाल पीड़ित को डराने के लिए किया जाता है। किसी भी वास्तविक जांच में फोन या वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को इस तरह लगातार निगरानी में रखना सामान्य कानूनी प्रक्रिया नहीं है।


अगर किसी को ऐसा कॉल आता है, तो उसे घबराकर पैसे ट्रांसफर करने के बजाय परिवार के भरोसेमंद सदस्य या संबंधित पुलिस/साइबर क्राइम प्राधिकरण से संपर्क करना चाहिए। भारत में साइबर फ्रॉड की शिकायत 1930 हेल्पलाइन और राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग सिस्टम के जरिए की जा सकती है।


निष्कर्ष

कुल मिलाकर, 'पार्सल में ड्रग्स मिला है' कहकर डराना डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड का एक जाना-पहचाना तरीका है। ऐसे कॉल में सबसे जरूरी बात है कि डर के दबाव में आकर पैसे या निजी बैंकिंग जानकारी साझा न की जाए और मामले की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जाए।