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सर्वोच्च न्यायालय में भोजशाला विवाद पर मुस्लिम पक्ष की याचिका

मुस्लिम समुदाय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है, जिसमें भोजशाला परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर बताया गया है। यह विवादित स्थल हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है। उच्च न्यायालय ने एएसआई के पूर्व आदेश को रद्द करते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय को मस्जिद के लिए अलग भूमि आवंटन के लिए सरकार से संपर्क करना चाहिए। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
 

भोजशाला परिसर का विवाद

मुस्लिम समुदाय ने गुरुवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसमें कहा गया था कि धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर है। हिंदू समुदाय इसे देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे 11वीं शताब्दी का कमल मौला मस्जिद मानता है। यह विवादित स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है। मस्जिद के काज़ी मोइनुद्दीन ने उच्च न्यायालय के 15 मई के आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हिंदू पक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा कि भोजशाला परिसर देवी सरस्वती को समर्पित है, और केंद्र तथा एएसआई इसके प्रबंधन और प्रशासन के लिए निर्णय ले सकते हैं।


उच्च न्यायालय का निर्णय

उच्च न्यायालय ने एएसआई के 7 अप्रैल, 2003 के आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें मुसलमानों को हर शुक्रवार को भोजशाला परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी। मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने यह भी कहा कि मुस्लिम समुदाय मस्जिद के निर्माण के लिए मध्य प्रदेश सरकार से अलग भूमि आवंटन के लिए संपर्क कर सकता है। अपने निर्णय में उच्च न्यायालय ने यह भी पाया कि भोजशाला परिसर में संस्कृत शिक्षण केंद्र और देवी सरस्वती के मंदिर के अस्तित्व के संकेत मिले हैं।