सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक संरचनाओं की सुरक्षा पर याचिका खारिज की
सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी
देश में सड़कों, पुलों और बिजली जैसी सार्वजनिक संरचनाओं की सुरक्षा से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की व्यापक मांगों पर निर्देश देना संभव नहीं है और न्यायालय पूरे देश का संचालन नहीं कर सकता।
याचिका की सुनवाई
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि इसमें इतनी विविध और व्यापक मांगें हैं कि उन पर एक साथ आदेश देना व्यावहारिक नहीं है।
याचिका की तुलना
अदालत ने याचिका की तुलना एक ऐसे स्थान से की जहां हर प्रकार की मांगें रखी गई हैं। पीठ ने कहा कि यह याचिका किसी प्रदर्शन कक्ष या खरीदारी केंद्र की तरह प्रतीत होती है, जिसमें गड्ढों वाली सड़कों की मरम्मत से लेकर अधूरे पुलों के निर्माण तक हर प्रकार की राहत मांगी गई है।
अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान, अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि इस तरह की व्यापक मांगों के साथ सर्वोच्च न्यायालय से पूरे देश के लिए निर्देश जारी करने की अपेक्षा करना उचित नहीं है।
राज्यों की स्थिति का महत्व
अदालत ने यह भी कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर आदेश देने के लिए राज्यों की वित्तीय स्थिति और स्थानीय परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। ऐसे मामलों में संबंधित उच्च न्यायालय अधिक उपयुक्त मंच होते हैं क्योंकि उन्हें अपने राज्य की प्रशासनिक और आर्थिक स्थिति की बेहतर जानकारी होती है।
याचिका में मांगी गई जानकारी
याचिका में केंद्र सरकार और अन्य संबंधित संस्थाओं को कई निर्देश देने की मांग की गई थी, जिसमें सार्वजनिक ढांचे की नियमित जांच, रखरखाव और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात शामिल थी।
सुरक्षा जांच समिति की मांग
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि देशभर में सार्वजनिक ढांचे की लापरवाही के कारण कई लोगों की जान चली जाती है, इसलिए इस दिशा में सख्त और व्यवस्थित निगरानी जरूरी है। याचिका में एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र सुरक्षा जांच समिति गठित करने की मांग भी की गई थी।
आंकड़ों का संग्रहण
इसके अलावा, याचिका में यह भी मांग की गई थी कि वर्ष 2020 के बाद से सार्वजनिक ढांचे से जुड़ी दुर्घटनाओं और मौतों का पूरा आंकड़ा एकत्र किया जाए, उसे डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया जाए और हर तीन महीने में जिलेवार रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पेश की जाए।
अदालत का निष्कर्ष
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है। अदालत ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दों को अधिक स्पष्ट और सीमित दायरे में लाकर संबंधित उच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है।
नई याचिका का सुझाव
अदालत के अनुसार, यदि याचिकाकर्ता उचित तरीके से तैयार की गई नई याचिका के साथ उच्च न्यायालय का रुख करता है, तो वहां इस विषय पर विस्तार से विचार किया जा सकता है।