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संदीप दीक्षित ने शशि थरूर की विदेश नीति पर की तीखी आलोचना

कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने अपने सहयोगी शशि थरूर की विदेश नीति पर तीखी आलोचना की है। उन्होंने थरूर की समझ को संदिग्ध बताते हुए कहा कि बिना मुद्दों को समझे राय रखना गंभीरता की कमी है। दीक्षित ने अमेरिका द्वारा अन्य देशों में हस्तक्षेप के उदाहरण दिए और तटस्थता के नकारात्मक परिणामों पर भी चर्चा की। इसके अलावा, उन्होंने प्रधानमंत्री की चुप्पी पर भी सवाल उठाए। जानें इस विवाद के पीछे की पूरी कहानी।
 

कांग्रेस नेता की आलोचना

कांग्रेस के नेता संदीप दीक्षित ने 20 मार्च को अपने सहयोगी शशि थरूर पर तीखा हमला करते हुए कहा कि थरूर ने ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले की निंदा करने में मोदी सरकार के संयम का समर्थन किया। दीक्षित ने यह भी कहा कि केरल के सांसद को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि वे बिना मुद्दों को समझे अपनी राय व्यक्त करते हैं।


उन्होंने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा कि थरूर, जो कि संयुक्त राष्ट्र के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैं, नेहरूवादी विदेश नीति की परंपरा का पालन करने के बजाय पेंशन और विनम्र संवाद पर ध्यान केंद्रित करते हैं।


थरूर की समझ पर सवाल

दीक्षित ने एक मीडिया चैनल को बताया कि उन्हें लगता है कि थरूर को मुद्दों की गहरी समझ नहीं है। उन्होंने कहा कि बिना समझ के राय रखने वाले व्यक्तियों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, थरूर की टिप्पणियां एक गंभीर व्यक्ति की सोच को नहीं दर्शाती हैं।


दीक्षित ने चेतावनी दी कि यदि हम चुपचाप ऐसी घटनाओं को देखते रहेंगे, तो अपवाद सामान्य हो जाएंगे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका ने वेनेजुएला में राष्ट्रपति को हटाया और ईरान में राष्ट्राध्यक्ष की हत्या की। यदि हम इन घटनाओं पर चुप रहते हैं, तो अमेरिका को अन्य देशों में ऐसा करने से कौन रोकेगा?


तटस्थता के नकारात्मक परिणाम

कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि कुछ परिस्थितियों में किसी देश की तटस्थता के नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि हर देश अपने हितों की रक्षा करता है, लेकिन कुछ बड़े सिद्धांत भी महत्वपूर्ण होते हैं।


दीक्षित ने उदाहरण देते हुए कहा कि जब हिटलर का शासन था, तब कई यूरोपीय देशों ने चुप रहने का निर्णय लिया था, लेकिन इसके गंभीर परिणाम सामने आए। यदि ऐसी परिस्थितियां फिर से उत्पन्न होती हैं, तो तटस्थता हानिकारक साबित हो सकती है।


प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल

दीक्षित ने दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में भारत की ओर से शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने वाले सरकारी अधिकारियों और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर प्रधानमंत्री की चुप्पी के बीच अंतर को स्पष्ट किया।


उन्होंने कहा कि शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर करना एक बात है, लेकिन ऐसी घटनाओं पर प्रधानमंत्री का चुप रहना एक अलग मामला है। विदेश सचिव की विदेश नीति में कोई भूमिका नहीं होती; यह प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री का कार्य है। समय की अहमियत को समझना आवश्यक है।