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विपक्ष की एकजुटता में दरारें: तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम के संकट का असर

हाल के घटनाक्रमों ने विपक्ष की एकजुटता को चुनौती दी है, खासकर तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम के भीतर संकट के चलते। ममता बनर्जी की पार्टी में विभाजन और तमिलनाडु में राजनीतिक समीकरणों में बदलाव ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को नई ताकत दी है। क्या विपक्ष अपनी एकजुटता को बनाए रख पाएगा? जानें इस महत्वपूर्ण राजनीतिक स्थिति के बारे में।
 

विपक्ष की एकजुटता पर संकट

केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के लिए हाल के समय में संसद के भीतर और बाहर विपक्ष की एकजुटता एक बड़ी चुनौती बन गई है। खासकर महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े विधेयक पर लोकसभा में सरकार को झटका मिलने के बाद यह संभावना जताई जा रही थी कि विपक्षी दल मिलकर सरकार के महत्वाकांक्षी विधायी कार्यक्रम को रोक सकते हैं। लेकिन अब राजनीतिक हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम जैसे प्रमुख क्षेत्रीय दलों में उत्पन्न संकट ने सत्तारूढ़ पक्ष को नई ताकत दी है।




पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे गंभीर संकट का सामना कर रही है। पार्टी के भीतर पहली बार खुला विभाजन देखने को मिला है। तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में से 58 ने ममता बनर्जी की पसंद के खिलाफ जाकर ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया है। यह पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। यह असंतोष केवल नेतृत्व शैली तक सीमित नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी नाराजगी बढ़ रही है।


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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या पार्टी अपने सांसदों को एकजुट रख पाएगी या फिर विधायकों की तरह सांसदों में भी टूट देखने को मिल सकती है। कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन अंदरखाने चिंता गहरी बताई जा रही है। एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि इस समय पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती संसद और उसके बाहर अपने सांसदों को एकजुट बनाए रखना है।




इस बीच, विपक्षी दलों के गठबंधन में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। लोकसभा में सरकार के संवैधानिक संशोधन विधेयक को रोकने में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम की साझा रणनीति निर्णायक रही थी। इन दलों के 185 सांसदों ने सदन की एक तिहाई से अधिक संख्या जुटाकर सरकार की राह रोकी थी। लेकिन अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर संकट और तमिलनाडु में बदलते राजनीतिक समीकरणों ने विपक्षी एकता को कमजोर कर दिया है।




तमिलनाडु में द्रविड मुनेत्र कषगम और कांग्रेस के संबंधों में भी खटास आ गई है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने द्रविड मुनेत्र कषगम से दूरी बनाते हुए विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्रि कषगम सरकार के साथ जाने का निर्णय लिया। इसके बाद द्रविड मुनेत्र कषगम के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। अब उसकी सीधी टक्कर तमिलगा वेत्रि कषगम से मानी जा रही है, जो कांग्रेस की सहयोगी है। भारतीय जनता पार्टी के भीतर यह आकलन किया जा रहा है कि ऐसे हालात में द्रविड मुनेत्र कषगम केंद्र सरकार के प्रति अपनी पुरानी आक्रामक नीति में नरमी ला सकता है और अधिक व्यवहारिक रुख अपना सकता है।




इस बीच, तृणमूल कांग्रेस के संकट ने राष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। आठ जून को लंबे अंतराल के बाद विपक्षी गठबंधन की बैठक प्रस्तावित है। सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी इस बैठक में शामिल होकर विपक्षी दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे। हालांकि, द्रविड मुनेत्र कषगम ने अब तक बैठक में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है, जिससे विपक्षी एकता को लेकर और सवाल खड़े हो गए हैं।




उधर, तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी उथलपुथल के बीच पार्टी नेतृत्व लगातार बैठकों में जुटा हुआ है। ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने हालात पर चर्चा कर आगे की रणनीति तय करने के लिए लंबी बैठकें की हैं। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चिंता संसद के आगामी मानसून सत्र को लेकर है, जहां विपक्ष की भूमिका पहले जैसी मजबूत नहीं दिख रही। अब तृणमूल कांग्रेस को संसद में अपनी रणनीति और जनसंपर्क दोनों को नए सिरे से तय करना होगा।




विपक्षी दलों की कमजोर होती एकजुटता और हाल के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की मजबूत स्थिति ने केंद्र सरकार का आत्मविश्वास बढ़ाया है। सरकार अब एक साथ चुनाव कराने जैसे महत्वाकांक्षी विधायी कार्यक्रमों को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी में है। साथ ही विपक्ष के भीतर बढ़ती दरारों का राजनीतिक लाभ उठाने की रणनीति भी बनाई जा रही है। महाराष्ट्र के कुछ विपक्षी सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं ने भी इन अटकलों को और बल दिया है।




हालांकि, राजनीतिक हलकों में अब यह माना जा रहा है कि यदि विपक्ष अपने आंतरिक मतभेदों को जल्द दूर नहीं कर पाया तो संसद में सरकार को घेरने की उसकी क्षमता कमजोर पड़ सकती है। आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम की दिशा ही यह तय करेगी कि विपक्ष दोबारा मजबूत एकजुटता कायम कर पाता है या भारतीय जनता पार्टी के लिए राष्ट्रीय राजनीति की राह और आसान हो जाती है।