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वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर विवाद: पुनर्विकास या विरासत का अपमान?

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्विकास कार्यों ने विवाद को जन्म दिया है। देवी अहिल्याबाई होलकर की मूर्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों ने स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। प्रशासन ने इसे गलतफहमी बताया है, जबकि विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने इसे विरासत पर हमला करार दिया है। इस विवाद ने न केवल वाराणसी, बल्कि मध्य प्रदेश के इंदौर में भी तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न की हैं। जानें इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और प्रशासन का रुख क्या है।
 

मणिकर्णिका घाट का विवाद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में मणिकर्णिका घाट इन दिनों पुनरुद्धार और विकास कार्यों के कारण विवाद का केंद्र बन गया है। घाट पर चल रहे निर्माण कार्यों और अतिक्रमण हटाने के अभियान के दौरान देवी अहिल्याबाई होलकर की लगभग सौ साल पुरानी मूर्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों ने स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। प्रशासन इसे गलतफहमी मानता है, जबकि विभिन्न सामाजिक, धार्मिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने इसे विरासत और आस्था पर हमला बताया है।


प्रदर्शन और आरोप

वाराणसी में विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व पाल समाज समिति के सदस्यों ने किया है, जिन्होंने आरोप लगाया है कि पुनरुद्धार के नाम पर मणिकर्णिका घाट के मूल स्वरूप में बिना किसी पूर्व सूचना के बदलाव किए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि देवी अहिल्याबाई होलकर की ऐतिहासिक मूर्ति को हटा दिया गया या क्षतिग्रस्त किया गया है। उनके अनुसार, यह मूर्ति केवल एक पत्थर की प्रतिमा नहीं, बल्कि समुदाय की आस्था और इतिहास का प्रतीक है।


समर्थन और धार्मिक भावनाएं

प्रदर्शन को मराठी समुदाय के कुछ वर्गों, धनगर समाज और अन्य स्थानीय समूहों का समर्थन भी मिला है। सनातन रक्षक दल के अध्यक्ष अजय शर्मा ने आरोप लगाया कि घाट पर कई प्रतिष्ठित मूर्तियों को मशीनों से तोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि जिन मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा होती है, उन्हें जीवित माना जाता है, और इस तरह का ध्वस्तीकरण धार्मिक भावनाओं का अपमान है।


प्रशासन का स्पष्टीकरण

हालांकि, प्रशासन ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है। वाराणसी के जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने स्पष्ट किया कि मणिकर्णिका घाट पर चल रहे कार्यों का उद्देश्य केवल सुविधाओं में सुधार और स्वच्छता है। उन्होंने कहा कि प्रभावित कलाकृतियों को संस्कृति विभाग द्वारा सुरक्षित स्थान पर रखा गया है और कार्य पूर्ण होने के बाद उन्हें पुनः स्थापित किया जाएगा।


स्थानीय प्रतिक्रिया

उपजिलाधिकारी आलोक वर्मा ने कहा कि घाट के आसपास रहने वाले अधिकांश लोग विरोध नहीं कर रहे हैं, और विरोध प्रदर्शनों में कुछ बाहरी तत्वों के शामिल होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। प्रशासन और पुलिस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।


मध्य प्रदेश में प्रतिक्रिया

यह विवाद केवल वाराणसी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मध्य प्रदेश के इंदौर में भी तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न की है, जहां अहिल्याबाई होलकर की विरासत को गहरी श्रद्धा से देखा जाता है। नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने दावा किया कि मणिकर्णिका घाट पर अहिल्याबाई द्वारा निर्मित प्राचीन मंदिरों और प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचा है।


राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा गरमा गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया कि सौंदर्यीकरण और व्यावसायीकरण के नाम पर धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को मिटाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मणिकर्णिका घाट का उल्लेख गुप्त काल से मिलता है और इसे तोड़ना काशी की आत्मा पर आघात है।


भाजपा का रुख

भाजपा के सूत्रों के अनुसार, यह मामला प्रधानमंत्री कार्यालय और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय तक पहुंच चुका है। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि पुनर्विकास के साथ-साथ विरासत का संरक्षण भी प्राथमिकता रहेगी।


संवेदनशीलता का मुद्दा

मणिकर्णिका घाट हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और पवित्र श्मशान स्थलों में से एक है, और यहां किसी भी प्रकार का निर्माण या बदलाव अत्यंत संवेदनशील विषय बन जाता है। वर्तमान विवाद ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे साधा जाए।