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लाहौर में सांस्कृतिक पहचान की बहाली पर कट्टरपंथ का दबाव

पाकिस्तान में लाहौर की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने के प्रयासों पर कट्टरपंथ का दबाव बढ़ता जा रहा है। पंजाब सरकार ने ऐतिहासिक नामों की बहाली के अपने फैसले से पीछे हटने के संकेत दिए हैं, जिससे धार्मिक उन्माद का प्रभाव स्पष्ट हो रहा है। इस घटनाक्रम में कट्टरपंथी संगठनों का विरोध और सरकार की रक्षात्मक मुद्रा ने एक बार फिर पाकिस्तान में सांस्कृतिक विरासत और कट्टरपंथ के बीच की जंग को उजागर किया है। क्या लाहौर की पुरानी पहचान को फिर से जीवित किया जा सकेगा? जानिए पूरी कहानी में।
 

लाहौर की ऐतिहासिक पहचान पर संकट

पाकिस्तान में कट्टरपंथ को हमेशा से सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक तथ्यों पर प्राथमिकता दी गई है। हाल ही में लाहौर में इस बात का एक नया उदाहरण देखने को मिला है। पंजाब सरकार ने लाहौर की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने के अपने निर्णय से पीछे हटने के संकेत दिए हैं। जिन सड़कों और मोहल्लों के नाम लाहौर की साझा सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा थे, उन्हें पुनर्जीवित करने की कोशिश अब धार्मिक उन्माद के प्रभाव में आ गई है। मरियम नवाज की सरकार ने जिस पहल को ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण का अभियान बताया था, वह अब कट्टरपंथी ताकतों के विरोध के सामने कमजोर होती नजर आ रही है।


सरकारी बैठक और प्रस्ताव

लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल समिति ने मार्च में एक महत्वपूर्ण बैठक में शहर के कई पुराने नामों को पुनर्स्थापित करने का प्रस्ताव पारित किया था। इस बैठक की अध्यक्षता पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने की थी। सरकार ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा की थी कि लाहौर की ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए पुराने नामों को वापस लाया जाएगा।


कट्टरपंथियों का विरोध

जैसे ही यह प्रस्ताव सार्वजनिक हुआ, कट्टरपंथी संगठनों और सोशल मीडिया पर सक्रिय प्रचारकों ने इसे “हिंदू और सिख पहचान को वापस लाने की साजिश” करार दिया। इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने रक्षात्मक रुख अपनाया। लाहौर के उपायुक्त कैप्टन मुहम्मद अली एजाज ने कहा कि “अभी ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है” जबकि पहले ही इस प्रस्ताव को मंजूरी दी जा चुकी थी।


पुराने नामों की बहाली का विवाद

विवाद उन नामों को लेकर है जो विभाजन से पहले लाहौर की पहचान थे। प्रस्ताव में फातिमा जिन्ना रोड को क्वीन्स रोड, अल्लामा इकबाल रोड को जेल रोड, और बाग ए जिन्ना रोड को लारेंस रोड में बदलने का सुझाव दिया गया था। इसी तरह इस्लामपुरा का पुराना नाम कृष्ण नगर और मौलाना जफर अली खान चौक का नाम लक्ष्मी चौक बहाल करने का प्रस्ताव था।


सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा

इन नामों का संबंध उस समय से है जब लाहौर एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक शहर था। विभाजन के बाद, पाकिस्तान की सरकारों ने कई हिंदू, सिख और औपनिवेशिक नामों को बदल दिया। हालांकि, आम लोगों की स्मृति में ये नाम आज भी जीवित हैं। यही कारण है कि इतिहासकारों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इन्हें वापस लाने के पक्ष में है।


नई बैठक और विशेषज्ञों की राय

कट्टरपंथियों के विरोध के बाद, लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल समिति ने एक नई बैठक बुलाई जिसमें इतिहासकारों, वास्तु विशेषज्ञों और नगर योजनाकारों ने लाहौर की सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा की। समिति के अनुसार, अधिकांश विशेषज्ञों ने माना कि लाहौर की पुरानी पहचान एक अमूल्य धरोहर है जिसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए।


नवाज शरीफ का समर्थन

नवाज शरीफ इस योजना के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं। उन्होंने केवल पुराने नामों की बहाली की बात नहीं की, बल्कि लाहौर के ऐतिहासिक खेल मैदानों को भी पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन अब यह घटनाक्रम पाकिस्तान की राजनीति और समाज का एक असहज सच उजागर कर रहा है।


कट्टरपंथी सोच का प्रभाव

यह घटनाक्रम एक बार फिर साबित करता है कि पाकिस्तान में सांस्कृतिक विरासत से ज्यादा कट्टरपंथी सोच को महत्व दिया जाता है। लाहौर की पुरानी पहचान से जुड़े नामों को दबाने की कोशिश की गई क्योंकि उनका संबंध हिंदू और सिख विरासत से था। मरियम नवाज सरकार का अपने ही फैसले से पीछे हटना इस बात का प्रमाण है कि वहां की सत्ता अल्पसंख्यकों की ऐतिहासिक मौजूदगी को स्वीकार करने से कतराती है।