रेमो: भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का अद्वितीय कॉम्बैट डॉग
रेमो की प्रेरणादायक यात्रा
जब रेमो पहली बार खाकी वर्दी वालों के बीच आया, तब वह केवल तीन महीने का एक प्यारा पिल्ला था। उसे न तो युद्ध का अनुभव था और न ही सीमाओं का ज्ञान। लेकिन आज, वह भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) का एक बहादुर योद्धा बन चुका है, जो नक्सली आईईडी और बारूद के सामने भी अडिग रहता है। रेमो की कहानी उन सैकड़ों कॉम्बैट डॉग्स की हिम्मत की दास्तान है, जिन्हें खेल-खेल में मौत को मात देने का प्रशिक्षण दिया जाता है.
रेमो की पहली तैनाती
रेमो के हैंडलर ने बताया कि उसकी पहली तैनाती छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में हुई थी, जहां जमीन के नीचे छिपे आईईडी जवानों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनते हैं। रेमो ने अपनी सूंघने की क्षमता से कई बार सुरक्षा बलों का मार्ग प्रशस्त किया। उसे एक कुशल विस्फोटक खोजी कुत्ता बनाने में पूरे नौ महीने लगे।
प्रशिक्षण की प्रक्रिया
रेमो के हैंडलर ने बताया कि कुत्तों को सेना में शामिल करने के लिए उनकी उम्र तीन महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके बाद, उन्हें 9 से 18 महीनों का कठोर प्रशिक्षण दिया जाता है, जो तीन चरणों में पूरा होता है: बेसिक कमांड, बिहेवियर टेस्ट, और स्पेशलाइजेशन।
प्रशिक्षण के पहले चरण में कुत्ते और हैंडलर के बीच तालमेल स्थापित किया जाता है। दूसरे चरण में कुत्ते की क्षमता के अनुसार यह तय किया जाता है कि वह विस्फोटक खोजेगा या नशीले पदार्थों की पहचान करेगा। तीसरे चरण में, उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसमें उन्हें सही गंध पहचानने पर इनाम दिया जाता है।
कुत्तों की विशेषताएँ
प्रशिक्षण के दौरान कुत्तों को शारीरिक रूप से भी तैयार किया जाता है। उन्हें विभिन्न सतहों पर चलने और बाधाओं को पार करने का अभ्यास कराया जाता है। रेमो की ट्रेनिंग का सबसे कठिन हिस्सा उसे साइलेंट इंडिकेशन सिखाना था।
कुत्तों को यह सिखाया जाता है कि वे गंध मिलते ही चुपचाप बैठ जाएं, जिससे हैंडलर को संकेत मिल सके। आईटीबीपी में विस्फोटक की पहचान के लिए बेल्जियम मेलिनोइस नस्ल के कुत्तों को प्राथमिकता दी जाती है।
सेवानिवृत्ति और देखभाल
अगर कोई कुत्ता उम्र या स्वास्थ्य कारणों से ड्यूटी करने में असमर्थ होता है, तो उसे चिकित्सीय परीक्षण के बाद सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। आईटीबीपी के प्रशिक्षित कुत्तों ने नक्सल रोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इन्हें भीड़-भाड़ वाले आयोजनों में भी तैनात किया जाता है।