राही मासूम रजा की जन्मशती समारोह का आगाज, साहित्यिक धरोहर का पुनर्मूल्यांकन
राही मासूम रजा की रचनात्मक विरासत का उत्सव
नई दिल्ली, 2 अगस्त - ‘‘मैं समय हूं। मैं कभी रुकता नहीं, मैं हमेशा आगे बढ़ता रहता हूं।’’ ये शब्द दूरदर्शन के प्रसिद्ध धारावाहिक ‘महाभारत’ के लेखक राही मासूम रजा की रचनात्मकता को दर्शाते हैं। शनिवार को अंजुमन तरक्की उर्दू (हिंद) के सभागार में इन पंक्तियों की गूंज सुनाई दी, जहां रजा की जन्मशती वर्ष समारोह का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर रजा के जन्मशती वर्ष के कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। इनमें उनकी पुस्तकों का मूल उर्दू लिपि में पुनः प्रकाशन और उनकी साहित्यिक धरोहर पर चर्चा शामिल है, ताकि उनके योगदान को सही मान्यता मिल सके। साहित्यिक संस्था ने यह भी बताया कि रजा की जन्मतिथि से जुड़ी एक पुरानी गलती को भी सुधारने का निर्णय लिया गया है।
अंजुमन तरक्की उर्दू (हिंद) के महासचिव अतहर फारूकी ने कहा, ‘‘समारोह की शुरुआत जानबूझकर एक अगस्त से की गई है, क्योंकि यही राही मासूम रजा की असली जन्मतिथि है। लंबे समय से यह गलत धारणा बनी रही कि उनका जन्म एक सितंबर को हुआ था। इस भूल को सुधारना ही जन्मशती वर्ष की सार्थक शुरुआत है।’’
रजा का पहला उपन्यास ‘आधा गांव’ भारतीय साहित्य में उनकी पहचान का आधार बना। जन्मशती समारोह के प्रमुख कार्यक्रमों में इस उपन्यास का मूल उर्दू लिपि में प्रकाशन शामिल है, जो पहली बार 1966 में हिंदी में प्रकाशित हुआ था।
फारूकी ने बताया कि ‘आधा गांव’ का मूल उर्दू पाठ राही की हस्तलिपि में अंजुमन के अभिलेखागार में सुरक्षित है। यह पांडुलिपि परिवार द्वारा संरक्षित की गई थी, जिससे एक बड़े अकादमिक प्रयास की शुरुआत हुई।
यह उपन्यास गाजीपुर जिले के गंगौली गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित है और विभाजन के समय शिया मुस्लिम जमींदार परिवारों के जीवन को दर्शाता है। कार्यक्रम में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि रजा की रचनाओं का उर्दू में प्रकाशन सांस्कृतिक विरासत के साथ न्याय करेगा।
उन्होंने कहा, ‘‘हम अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति के साथ राही मासूम रजा के योगदान को सही तरीके से नहीं समझ पाए। आज इसे सुधारने का प्रयास सफल होता दिख रहा है।’’
इस अवसर पर पूर्व लोकसभा सदस्य सुभाषिनी अली, प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी, विभूति नारायण राय, और अन्य प्रमुख साहित्यकार भी उपस्थित थे। विभूति नारायण राय ने बताया कि रजा को ‘आधा गांव’ का उर्दू में प्रकाशन कराने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था।
उन्होंने कहा, ‘‘इस उपन्यास में भोजपुरी का प्रभाव है, और इसमें ऐसे शब्द हैं जिन्हें उर्दू प्रकाशक स्वीकार करने में हिचकते थे।’’
राय ने बताया कि कुंवरपाल सिंह ने रजा के साथ मिलकर पूरी पुस्तक का अनुवाद किया, और इसके बाद अक्षर प्रकाशन ने 1966 में इसे हिंदी में प्रकाशित किया।