राजस्थान की महान मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि
अल्लाह जिलाई बाई की जादुई आवाज़
1987 में लंदन के क्वीन एलिजाबेथ हॉल में उनकी आवाज़ इतनी प्रभावशाली थी कि माइक्रोफ़ोन हटाने पड़े थे।
पद्मश्री और राजस्थान रत्न से सम्मानित मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई की 34वीं पुण्यतिथि पर उनकी परपोती द्वारा लिखी गई श्रद्धांजलि।
जयपुर। राजस्थान, जिसे वीरों की भूमि और कला-संस्कृति का केंद्र माना जाता है, ने कई अद्वितीय प्रतिभाओं को जन्म दिया है। इनमें से एक हैं अल्लाह जिलाई बाई, जिनकी मांड गायिकी ने न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया। उनके प्रसिद्ध गीत 'केसरियां बालम आओं नी पधारों म्हारे देश' आज भी सुनने पर रोंगटे खड़े कर देते हैं। बीकानेर राजघराने में महाराजा गंगासिंह के दरबार से गायिकी की शुरुआत करने वाली अल्लाह जिलाई बाई की पुण्यतिथि पर उनकी कहानी उनकी पड़पोती के शब्दों में।
कुछ आवाज़ें मनोरंजन करती हैं, कुछ दिल को छू जाती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो किसी पूरी संस्कृति की पहचान बन जाती हैं। मेरी परदादी, पद्मश्री अल्लाह जिलाई बाई की आवाज़ ऐसी ही थी। वे केवल एक प्रसिद्ध मांड गायिका नहीं थीं, बल्कि मेरी जाई माँ थीं। उन्होंने मुझे आत्मनिर्भरता, इंसानियत और बेख़ौफ़ जीने का सलीका सिखाया।
मुझे आज भी थार के रेगिस्तान की एक ठंडी शाम याद है। आसमान तारों से भरा हुआ था, और चाँद अपनी पूरी रौनक में था। उनकी आवाज़ रेगिस्तान में गूंज रही थी, मानो पूरा क्षेत्र उनके सुरों के साथ साँस ले रहा हो। गीत खत्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट से माहौल गूंज उठा। सामने सफेद साड़ी में एक छोटी कद-काठी की महिला खड़ी थीं, जो अल्लाह जिलाई बाई थीं। स्थानीय लोग, विदेशी सैलानी और उनके साथ संगत करने वाले कलाकार, सभी उनकी आवाज़ और व्यक्तित्व के दीवाने थे। यह दृश्य आज भी मेरे मन में ताजा है।
एक अद्वितीय आवाज़
अल्लाह जिलाई बाई का जन्म नबी बख़्श और अलीमीन के घर हुआ। वे चौथी संतान थीं, लेकिन जीवित बचने वाली इकलौती संतान। माता-पिता ने उनका नाम अल्लाह जिलाई रखा, जिसका अर्थ है 'जिसे अल्लाह ने ज़िंदगी दी हो'। उन्हें नहीं पता था कि यह बच्ची एक दिन राजस्थान की सबसे प्रिय और प्रसिद्ध आवाज़ बनेगी। उनकी गायकी में एक अलौकिक आकर्षण था। मुझे हमेशा आश्चर्य होता था कि वे रोज़ाना रियाज़ नहीं करती थीं, फिर भी उनकी आवाज़ में गहराई और बुलंदी थी।
जुलाई 1987 में लंदन के Queen Elizabeth Hall, Purcell Room में उनके कार्यक्रम की कहानियाँ आज भी सुनाई देती हैं। उनकी आवाज़ इतनी जोरदार थी कि तकनीकी टीम को माइक्रोफ़ोन हटाने पड़े। वहाँ उपस्थित विभिन्न देशों के लोग उनकी गायकी से इतने प्रभावित हुए कि कई की आँखें नम हो गईं। भाषा कभी भी उनके और उनके श्रोताओं के बीच बाधा नहीं बनी। लोग राजस्थानी समझें या न समझें, उनके सुर सीधे दिल तक पहुँचते थे। भारत सरकार ने उन्हें 1982 में पद्मश्री से सम्मानित किया। 1988 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला और 2012 में राजस्थान सरकार ने उन्हें राजस्थान रत्न से नवाज़ा। ये सम्मान उनकी उपलब्धियों का प्रमाण हैं, लेकिन उन्हें करीब से जानने वालों के लिए वे इससे कहीं बढ़कर थीं।
मेरी जाई माँ, मेरे बचपन की साथी
मेरे पिता डॉ. अज़ीज़ अहमद सुलेमानी उनके सबसे प्रिय नवासे थे और मैं उनकी पहली परपोती। मेरा बचपन उनके प्यार और दुलार में बीता। मुझे याद है, जैसलमेर के मरु महोत्सव में जब वे गाती थीं, तो मैं उनकी गोद में सो जाती थी। बीकानेर में दूरदर्शन के उद्घाटन समारोह में भी मैं उनके साथ थी। वे मुझे स्कूल बस के स्टॉप तक छोड़ने जातीं और कंडक्टर को ख़ास हिदायत देतीं कि बच्ची का ख़याल रखना। जब मैं दसवीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रही थी, तब सर्दियों की सुबह पाँच बजे मुझे गणित की ट्यूशन के लिए जगाना भी उन्हीं का काम था।
आज सोचती हूँ तो दिल में एक कसक उठती है कि काश, मैं कुछ साल पहले पैदा हुई होती और उनके साथ और शहरों का सफ़र कर पाती।
नारीवाद का पहला सबक़
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस होता है कि नारीवाद और महिला सशक्तीकरण के मेरे शुरुआती सबक़ मुझे किसी किताब या कक्षा से नहीं, बल्कि अपनी जाई माँ के जीवन से मिले थे। वे अक्सर कहती थीं, 'मैं अपनी कमाई खाती हूँ। किसी पर निर्भर नहीं हूँ। मेरी ज़िंदगी के फ़ैसले कोई दूसरा क्यों करे?' उनका मानना था कि औरत का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बेहद ज़रूरी है।
उनका जीवन-दर्शन बहुत सीधा था—सच्चाई से जीओ, ग़लत काम मत करो और किसी से डरो मत। वे कहती थीं, 'अल्लाह के सिवा किसी से डरने की ज़रूरत नहीं। डरना है तो सिर्फ़ ग़लत काम करने से डरो।' उनका दिया हुआ एक सबक़ आज भी मेरे साथ है—निर्भय रहो, मान रखो और सिर ऊँचा करके जियो।
अपनी मिट्टी से मोहब्बत
जाई माँ बेहद मज़हबी थीं। वे पाँचों वक़्त की नमाज़ अदा करतीं और रमज़ान के रोज़े रखतीं। उनका अपने रब से गहरा रिश्ता था। वे मानती थीं कि सच्चे दिल से माँगी गई दुआ में बड़ी ताक़त होती है। लेकिन उनका अपनी मिट्टी से रिश्ता भी उतना ही गहरा था। बँटवारे के समय जब उनके कई रिश्तेदार सरहद पार चले गए, तब उन्होंने बीकानेर छोड़ने से इनकार कर दिया।
महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से वे बेहद प्रभावित थीं। जब इंदिरा गांधी की हत्या की ख़बर आई, तो वे टेलीविज़न के सामने फूट-फूटकर रोई थीं। उनकी देशभक्ति उनके गहरे जुड़ाव में दिखाई देती थी।
एक ऐसी परदादी, जिन्होंने अगली पीढ़ी के सपनों को पंख दिए
उनके व्यक्तित्व का एक और पहलू मेरे पिता से जुड़ी एक घटना में दिखाई देता है। मेरे पिता का बचपन आर्थिक तंगी में गुज़रा। सीमित संसाधनों के बावजूद जाई माँ ने उनकी पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। जब मेरे पिता ने मेडिकल कॉलेज में अध्यापन का काम करने का फ़ैसला किया, तो जाई माँ ख़ुश नहीं हुईं। उन्होंने तुरंत ताँगा बुलवाया और पिता को मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल के कमरे में ले गईं।
जाई माँ ने शायद ख़ुद औपचारिक शिक्षा के अधिक अवसर नहीं पाए, लेकिन वे शिक्षा की ताक़त को बख़ूबी समझती थीं।
कुछ छोटी-छोटी बातें, जो उन्हें और अपना बनाती थीं
जाई माँ को घर का खाना खाते-खाते कभी-कभी ऊब हो जाती थी। फिर वे किसी न किसी बहाने मेरी दादी माँ से नोकझोंक कर लेतीं और घर का खाना खाने से इनकार कर देतीं। इसके बाद बीकानेर रेलवे स्टेशन के पास मशहूर छोटू-मोटू जोशी की दुकान से पूरी-आलू और मेथी की सब्ज़ी मँगवाई जाती।
आवाज़ ख़ामोश हुई, मगर सबक़ आज भी ज़िंदा हैं
3 नवम्बर 1992 को दुनिया ने उनकी जादुई आवाज़ को आख़िरी बार सुना। आज उनकी 34वीं पुण्यतिथि पर मैं उस महान गायिका को याद कर रही हूँ, जिसकी मांड गायकी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गई। मैं आज एक विकास क्षेत्र की पेशेवर हूँ और लड़कियों की शिक्षा, महिलाओं के नेतृत्व और लैंगिक समानता के मुद्दों पर काम करती हूँ।
शबनम अज़ीज़
(विकास क्षेत्र की एक अनुभवी पेशेवर हैं, वे वर्तमान में सेंटर फॉर कैटेलाइजिंग चेंज (C3) में शिक्षा पहल की प्रमुख हैं)