राघव चड्ढा का दल-बदल: एक विडंबना
राघव चड्ढा का भाजपा में शामिल होना
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने हाल ही में भाजपा में शामिल होकर एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है। उनके साथ छह अन्य सांसद भी आम आदमी पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं। यह बदलाव राघव चड्ढा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, क्योंकि यदि उनका लाया हुआ बिल पास हो गया होता, तो शायद वे आज पार्टी नहीं छोड़ते।
चार साल पहले, राघव चड्ढा ने एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था, जिसका उद्देश्य दल-बदल कानून को सख्त बनाना था। यदि वह बिल कानून बन गया होता, तो उन्हें भाजपा में शामिल होने के लिए अपनी पार्टी के सात सदस्यों का समर्थन प्राप्त करना पड़ता।
राघव चड्ढा ने अगस्त 2022 में यह बिल पेश किया था, जिसमें दल-बदल के लिए आवश्यक समर्थन की संख्या को दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई करने का प्रस्ताव था। इस बिल के अनुसार, यदि कोई पार्टी के दो-तिहाई सदस्य दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं माना जाता। लेकिन चड्ढा के प्रस्तावित बिल में इसे बढ़ाकर तीन-चौथाई किया गया था।
इस बिल का उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करना और जन प्रतिनिधियों को राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बजाय सक्षम कानून निर्माता बनाना था। इसके तहत, यदि कोई सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलता है, तो उसे छह साल तक चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होती।
राघव चड्ढा ने अपने बिल में यह भी कहा था कि दल-बदल कानून का मुख्य उद्देश्य विधायकों और सांसदों के खरीद-फरोख्त को रोकना है। लेकिन आज भी यह समस्या बनी हुई है।
विडंबना यह है कि राघव चड्ढा, जो पहले इस कानून को सख्त बनाने की बात कर रहे थे, अब खुद भाजपा में शामिल हो गए हैं। यदि उनका 2022 का बिल कानून बन जाता, तो उन्हें आज भाजपा में शामिल होने के लिए अधिक समर्थन की आवश्यकता होती।