मुंबई उच्च न्यायालय में गडकरी के खिलाफ अपमानजनक डीपफेक वीडियो पर सुनवाई
गडकरी के खिलाफ अपमानजनक सामग्री पर सुनवाई
मुंबई, 28 जुलाई: मुंबई उच्च न्यायालय ने मंगलवार को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के खिलाफ अपलोड किए गए 'डीपफेक वीडियो' और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित अपमानजनक पोस्ट के मामले में 'मेटा', 'एक्स कॉर्प', 'गूगल एलएलसी' और अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दायर याचिका पर 5 अगस्त को सुनवाई करने का निर्णय लिया है। न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर की पीठ ने गडकरी के वकील संदीप लड्डा को निर्देश दिया कि वे इस दीवानी याचिका की प्रतियां प्रतिवादियों को सौंपें। याचिका में गडकरी की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट के प्रसार पर स्थायी रोक लगाने की मांग की गई है।
'डीपफेक' वीडियो को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की सहायता से इस तरह से बनाया जाता है कि उसमें कोई व्यक्ति ऐसी बातें कहता या करता हुआ दिखाई देता है, जो उसने वास्तव में नहीं कही। गडकरी ने अपनी याचिका में फर्जी और मनगढ़ंत सामग्री को तुरंत हटाने और ऐसी सामग्रियों के प्रसार पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता ने कहा है कि एथनॉल-मिश्रित ईंधन के मुद्दे पर इंटरनेट पर कई फर्जी, एआई-निर्मित और मानहानिकारक पोस्ट मौजूद हैं।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि अज्ञात व्यक्तियों ने 'डीपफेक वीडियो' और पोस्ट अपलोड किए हैं, जिनमें उन्हें एथनॉल-मिश्रित ईंधन के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया गया है और आरोप लगाया गया है कि इससे केंद्रीय मंत्री और उनके परिवार को वित्तीय लाभ हुआ है। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि इससे गडकरी की प्रतिष्ठा और व्यक्तित्व अधिकारों को अपूरणीय क्षति पहुंची है। याचिका के अनुसार, सोशल मीडिया पोस्ट में लगाए गए आरोप 'झूठे, दुर्भावनापूर्ण और अत्यधिक मानहानिकारक' हैं, और इन्हें गडकरी के खिलाफ जनता में एक भ्रामक धारणा बनाने के लिए तैयार किया गया है।
इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि एथनॉल-मिश्रण ईंधन कार्यक्रम और ई-20 नीति का कार्यान्वयन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा किया जाता है, न कि व्यक्तिगत रूप से गडकरी द्वारा। याचिका में यह भी कहा गया है कि निष्पक्ष या सद्भावनापूर्ण टिप्पणियों को दबाने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है, लेकिन यह दावा किया गया है कि गैर-जिम्मेदाराना और मानहानिकारक आरोपों ने अभिव्यक्ति की वैधानिक सीमा को पार कर लिया है।