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मास्कुलिनिटी कैंप: क्या यह पुरुषों के लिए एक नया अनुभव है?

आज के डिजिटल युग में, कई पुरुष खुद को कमजोर महसूस कर रहे हैं, जिसके चलते अमेरिका में मास्कुलिनिटी कैंप का चलन बढ़ रहा है। ये कैंप पुरुषों को शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करते हैं। क्या ये अनुभव वास्तव में जीवन में बदलाव लाते हैं या सिर्फ एक महंगा ड्रामा हैं? इस लेख में हम इन कैंपों के पीछे के सच और उनके प्रभाव पर चर्चा करेंगे।
 

डिजिटल युग में पुरुषों की मानसिकता

आज के तेज़-तर्रार और तकनीकी युग में, कई पुरुष खुद को असहाय और कमजोर महसूस कर रहे हैं। इस कमी को दूर करने के लिए अमेरिका समेत कई देशों में मास्कुलिनिटी कैंप का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इसे एक आधुनिक संस्कार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जहां पुरुष 2.5 लाख रुपये ($3000) से लेकर 15 लाख रुपये तक की भारी फीस चुकाकर शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करते हैं। कीचड़ में रेंगना, ठंड सहना और घंटों तक बिना सोए रहना इन कैंपों का हिस्सा बन गया है। यह सब सुनने में दंड जैसा लगता है, लेकिन हजारों पुरुष इसे अपने जीवन का सबसे परिवर्तनकारी अनुभव मानते हैं।


क्या 75 घंटे का ‘नरक’ बदल सकता है पूरी जिंदगी?

कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में चलने वाले इन कैंपों का ढांचा बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। यहां पुरुषों को लगातार 75 घंटों तक शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ा जाता है। भारी लकड़ी के लट्ठों को उठाना, नींद की कमी और बर्फीले पानी में रहना यहां की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। आयोजकों का मानना है कि जब व्यक्ति अपनी शारीरिक सीमाओं के अंतिम छोर पर पहुंचता है, तभी उसका असली व्यक्तित्व सामने आता है। क्या यह सिर्फ एक महंगा ‘सेल्फ-हेल्प ड्रामा’ है या वास्तव में इससे अनुशासन आता है? यह सवाल आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है।


क्या अमीरों के बीच बढ़ रहा है यह चलन?

इन कैंपों में जाने वाले लोग आम व्यक्ति नहीं, बल्कि बड़े बिजनेसमैन, कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव्स और लीडर्स होते हैं। $3,000 की शुरुआती फीस के अलावा, विशेष गियर और यात्रा पर भी लाखों खर्च होते हैं। इन कैंपों को इस तरह से मार्केट किया जाता है कि यह केवल ‘चुनिंदा’ और ‘सफल’ लोगों के लिए हैं जो अपनी जिंदगी को ‘रिसेट’ करना चाहते हैं। 20 से 50 साल की उम्र के ये पुरुष, जो अपनी जिंदगी में ठहराव या बोरियत महसूस कर रहे हैं, यहां आकर वह अनुशासन और उद्देश्य तलाश रहे हैं जो उन्हें पारंपरिक थेरेपी या जिम में नहीं मिल पाता।


क्या ‘मर्दानगी’ के नाम पर हो रहा है खिलवाड़?

इन कैंपों में केवल शारीरिक मेहनत ही नहीं, बल्कि गहन इमोशनल ड्रामे का भी सहारा लिया जाता है। ग्रुप डिस्कशन के दौरान पुरुषों को अपने पुराने सदमों और डर पर खुलकर बात करने के लिए मजबूर किया जाता है। आयोजकों का तर्क है कि साझा किया गया ‘दर्द’ पुरुषों के बीच गहरे संबंध बनाता है और उन्हें एक बेहतर पिता, पति और लीडर बनने में मदद करता है। हालांकि, आलोचक इसे ‘नकली मिलिट्री ट्रेनिंग’ और मर्दानगी के पुराने ढर्रों को बढ़ावा देने वाला बताते हैं। उनका कहना है कि जो काम एक अच्छी थेरेपी कर सकती है, उसके लिए लाखों रुपये देकर खुद को टॉर्चर करवाना कहां की समझदारी है?