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महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की रक्षा: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गर्भावस्था को सरकारी रोजगार से वंचित करने का आधार नहीं माना है। अदालत ने कहा कि महिलाओं को मातृत्व और रोजगार में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करना उनके प्रजनन और आजीविका के अधिकारों का उल्लंघन है। यह निर्णय कोमल जायसवाल की याचिका पर आया, जिन्होंने वन रक्षक भर्ती के लिए आवेदन किया था। अदालत ने आयोग को निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह के भीतर उनकी शारीरिक दक्षता परीक्षा आयोजित करें। इस निर्णय ने महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा को एक नई दिशा दी है।
 

महिलाओं के रोजगार अधिकारों की सुरक्षा

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि गर्भावस्था किसी महिला को सरकारी नौकरी से वंचित करने का कारण नहीं बन सकती। अदालत ने कहा कि मातृत्व और रोजगार में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करना, महिला के प्रजनन अधिकार और आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है। यह आदेश 22 जुलाई को पारित किया गया था और हाल ही में अपलोड किया गया।


यह निर्णय कोमल जायसवाल द्वारा उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूपीएसएसएससी) के खिलाफ दायर विशेष अपील पर आया, जिसमें आयोग ने वन रक्षक और वन्यजीव रक्षक भर्ती के लिए उनकी शारीरिक दक्षता परीक्षा (पीईटी) को स्थगित करने का अनुरोध ठुकरा दिया था। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने आयोग के निर्णय और एकल पीठ के आदेश को निरस्त करते हुए आयोग को चार सप्ताह के भीतर पीईटी आयोजित करने का निर्देश दिया।


खंडपीठ ने कहा, 'राज्य और आयोग द्वारा गर्भावस्था के आधार पर पीईटी स्थगित करने से इनकार करना, वास्तव में एक महिला को संतान जन्म और रोजगार में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करना है। यह उसके प्रजनन और रोजगार के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है।' कोमल जायसवाल ने 2023 की वन रक्षक एवं वन्यजीव रक्षक भर्ती के लिए आवेदन किया था और लिखित परीक्षा पास करने के बाद उन्हें फरवरी 2026 में पीईटी में शामिल होना था।


उस समय वे नौ महीने की गर्भवती थीं और उन्होंने प्रसव के बाद 14 किलोमीटर की पैदल परीक्षा देने की अनुमति मांगी थी, लेकिन आयोग ने उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि भर्ती नियमों में पीईटी स्थगित करने का कोई प्रावधान नहीं है। अदालत ने कहा कि 'किसी महिला की वैवाहिक स्थिति या गर्भावस्था को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्यता का आधार नहीं माना जा सकता।'


पीठ ने यह भी कहा कि चूंकि नियमों में पीईटी स्थगित करने पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है, इसलिए आयोग को ऐसी असाधारण परिस्थितियों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि भर्ती विज्ञापन और लिखित परीक्षा के बीच दो वर्ष से अधिक का समय बीत गया, जिसमें विवाह और गर्भावस्था जैसी स्वाभाविक घटनाएं होना सामान्य है। ऐसी परिस्थितियों में किसी महिला को दंडित करना समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि कोमल जायसवाल पीईटी, चिकित्सीय परीक्षण और मेरिट सूची में सफल होती हैं, तो उन्हें उसी तिथि से सभी लाभों सहित नियुक्ति दी जाए, जिस तिथि को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महिला श्रेणी में उनसे कम मेरिट वाले अभ्यर्थी को नियुक्त किया गया था।


पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि इस प्रक्रिया के पूरा होने तक संबंधित श्रेणी का एक पद रिक्त रखा जाए।