महिला आरक्षण बिल पर संसद में पप्पू यादव का विवादास्पद बयान
महिला आरक्षण बिल पर चर्चा
पटना/दिल्ली: बिहार के पर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने संसद में महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के दौरान एक चौंकाने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा, '755 सांसदों पर यौन शोषण का आरोप है और 155 सांसदों पर चार्जशीट है। अगर भारत में किसी पर यौन शोषण का आरोप है, तो सबसे पहले नेता का नाम आता है।' 2029 के चुनावों से महिलाओं को विधानसभा और लोकसभा में आरक्षण देने का सरकार का सपना फिलहाल अधूरा रह गया है। केंद्र सरकार द्वारा पेश किया गया 'संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026' निचले सदन में आवश्यक आंकड़े जुटाने में असफल रहा।
सरकार ने इस विधेयक के साथ परिसीमन और संघ राज्य विधि से जुड़े पूरक विधेयक भी पेश किए थे, लेकिन मुख्य संशोधन विधेयक के गिरने के बाद पूरी प्रक्रिया ठप हो गई। चर्चा के दौरान नीतिगत विरोध भी देखने को मिला।
सरकार ने दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में असफलता दिखाई
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू करने से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक शुक्रवार को संसद के निचले सदन में पारित नहीं हो सका। इस विधेयक पर हुए मत विभाजन में पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि संविधान संशोधन विधेयक के पारित नहीं होने के बाद अब इससे संबंधित परिसीमन विधेयक 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक 2026 को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
पप्पू यादव का विवादास्पद दावा
महिला आरक्षण पर चर्चा के दौरान पप्पू यादव ने कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा, '755 सांसदों पर यौन शोषण का आरोप है। 155 सांसदों पर चार्जशीट है। सबसे ज्यादा भारत में अगर किसी पर यौन शोषण का आरोप है तो पहला नंबर है नेता।' उन्होंने यह भी कहा कि 'हमलोग महिलाओं के अधिकार की बातें करते हैं, लेकिन नेताओं में इंटरनेट पर पोर्न देखने की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा है।'
इसके बाद, पप्पू यादव ने विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं से जुड़े अपराधों का जिक्र किया और बताया कि किस राज्य में महिलाओं से जुड़े अपराधों का क्या डेटा है।
प्रक्रिया और सरकार की मंशा पर उठाए सवाल
पप्पू यादव ने विधेयक लाने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि बिना किसी विशेषज्ञ समिति की चर्चा या राज्यों से परामर्श किए बिना, तीन दिन का विशेष सत्र बुलाने की क्या आवश्यकता थी? हालांकि, उन्होंने खुद को महिला आरक्षण का समर्थक बताया, लेकिन सरकार द्वारा इसे पेश करने के तरीके को लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ करार दिया।