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ममता बनर्जी के खिलाफ ED की कार्रवाई: सुप्रीम कोर्ट का फैसला चुनावी राजनीति पर डालेगा असर

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोलकाता में I-PAC के कार्यालय और उसके निदेशक के घर पर छापेमारी की, जो कोयला घोटाले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच का हिस्सा है। ममता बनर्जी ने मौके पर पहुंचकर जांच में बाधा डाली, जिसके चलते ED ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने TMC की याचिका खारिज कर दी, और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला ममता के खिलाफ आता है, तो यह आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।
 

कोलकाता में ED की छापेमारी

  • 8 जनवरी 2026: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोलकाता में I-PAC, जो टीएमसी की चुनावी रणनीति बनाने वाली एक राजनीतिक परामर्श फर्म है, के कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के निवास पर छापे मारे। यह कार्रवाई कोयला घोटाले से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग की जांच का हिस्सा थी।
  • ममता बनर्जी मौके पर पहुंचीं और ED का आरोप है कि उन्होंने जांच में बाधा उत्पन्न की, सबूतों को अपने साथ ले गईं, यहां तक कि एक ED अधिकारी का फोन भी छीन लिया। ED ने ममता पर 17 गंभीर आरोप लगाए, जिनमें डकैती, लूट और सबूत नष्ट करने के आरोप शामिल हैं।
  • कलकत्ता हाई कोर्ट: TMC द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया गया, क्योंकि ED ने कहा कि उसने कुछ भी जब्त नहीं किया—सभी दस्तावेज और उपकरण ममता और उनकी टीम ने ले लिए। सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर टाल दी गई।
  • सुप्रीम कोर्ट: ED ने FIR दर्ज करने और पुलिस अधिकारियों (DGP राजीव कुमार, कोलकाता कमिश्नर) के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए याचिका दायर की। 15 जनवरी 2026 को सुनवाई हुई, जहां ED ने CBI जांच की मांग की। ममता की ओर से कैविएट दाखिल किया गया, और उनके वकीलों ने तर्क दिया कि छापे का उद्देश्य चुनाव से पहले राजनीतिक प्रतिशोध था, और संवेदनशील चुनावी डेटा को निशाना बनाया गया।
  • विपक्ष का प्रतिरोध: शुभेंदु अधिकारी ने ममता को मानहानि का नोटिस भेजा, जिसमें कोयला घोटाले में अमित शाह को जोड़ने का आरोप लगाया, और कहा कि वे अदालत में मिलेंगे।


मुख्य तर्क

ममता बनर्जी की “सड़क + अदालत” रणनीति अब तक सफल रही है, लेकिन इस बार वे खुद मुश्किल में हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय उनके पक्ष में आता है, तो वे खुद को “पीड़ित” बताकर अप्रैल 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में लाभ उठा सकती हैं। लेकिन यदि निर्णय उनके खिलाफ होता है (FIR दर्ज होती है), तो यह सरकार के लिए संकट का कारण बन सकता है और चुनाव का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाएगा। लेख इसे “हल्ला बोल” कहता है, लेकिन स्थिति कमजोर नजर आ रही है।