मथुरा-वृंदावन में भीड़ प्रबंधन पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
भीड़ प्रबंधन की चुनौतियाँ
प्रयागराज, एक अगस्त: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मथुरा और वृंदावन में भीड़ प्रबंधन की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि यहां भीड़ प्रबंधन का तरीका विज्ञान पर आधारित नहीं है और यह मुख्य रूप से यातायात प्रबंधन तक ही सीमित है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने हाल ही में होली जैसे त्योहारों के दौरान हुई भगदड़ की घटनाओं का उल्लेख करते हुए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, जिला मजिस्ट्रेट, नगर आयुक्त और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से विस्तृत हलफनामे मांगे हैं।
धार्मिक सभाओं की विशेषताएँ
अदालत ने यह भी कहा कि धार्मिक आयोजनों की प्रकृति राजनीतिक रैलियों और खेल आयोजनों से भिन्न होती है। श्रद्धालुओं का भावनात्मक जुड़ाव उन्हें संभावित खतरों के प्रति कम सतर्क बना सकता है। भीड़ विज्ञान पर किए गए अध्ययनों का हवाला देते हुए, अदालत ने बताया कि प्रति वर्ग मीटर चार से पांच लोगों की सघनता पर व्यक्तिगत नियंत्रण समाप्त होने लगता है, जबकि छह से सात लोगों की सघनता दम घुटने जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकती है।
अवैध निर्माणों की समस्या
एक याचिकाकर्ता ने अदालत में आरोप लगाया कि 23 अवैध निर्माणों में से केवल कुछ के खिलाफ कार्रवाई की गई है। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के हलफनामे के अनुसार, 2021-22 से 2025-26 के बीच 2,453 नोटिस जारी किए गए, जिनमें से 700 मामलों में ध्वस्तीकरण के आदेश दिए गए, लेकिन केवल 323 पर ही कार्रवाई की गई। इस अवधि में 104 संपत्तियों को सील भी किया गया।
दीर्घकालिक नगर नियोजन की आवश्यकता
अदालत ने यह भी कहा कि मथुरा, अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट जैसे धार्मिक स्थलों के लिए दीर्घकालिक नगर नियोजन की आवश्यकता है। तीर्थ स्थलों पर अवैध निर्माण की समस्या के समाधान के लिए केवल सख्त कानून ही नहीं, बल्कि मजबूत संस्थागत इच्छाशक्ति भी आवश्यक है।