भोजशाला विवाद: हाईकोर्ट ने मंदिर के रूप में किया मान्यता
मध्य प्रदेश के धार में भोजशाला को लेकर चल रहे विवाद में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भोजशाला एक मंदिर है, न कि मस्जिद। इसके साथ ही हिंदुओं को यहां पूजा करने की अनुमति दी गई है। एएसआई द्वारा किए गए सर्वेक्षण के आधार पर यह निर्णय लिया गया है। जानें इस फैसले के प्रमुख बिंदु और इसके पीछे का ऐतिहासिक संदर्भ।
May 16, 2026, 15:31 IST
भोजशाला का विवाद और हाईकोर्ट का निर्णय
मध्य प्रदेश के धार जिले में भोजशाला को लेकर विवाद काफी समय से चल रहा था। यहां यह बहस चलती रही कि यह कमाल मौला की मस्जिद है या एक मंदिर। हाल ही में, उच्च न्यायालय ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि भोजशाला वास्तव में एक मंदिर है, न कि मस्जिद। 2003 से यहां नमाज पढ़ने की अनुमति थी, लेकिन अब हिंदुओं को यहां पूजा करने की पूरी इजाजत मिल गई है, और इसे मां सरस्वती का मंदिर माना गया है। लंबे समय से हिंदू समुदाय इस अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा था। एएसआई ने 98 दिनों तक इस स्थल का सर्वेक्षण किया, जिसके बाद यह निर्णय आया। कोर्ट ने 2003 के एएसआई आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी। अब नमाज पर रोक लगा दी गई है, और हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार मिल गया है। एएसआई को इस स्थल की देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी दी गई है। मुस्लिम समुदाय के लिए कोर्ट ने कहा है कि यदि वे धार में मस्जिद बनाने के लिए जमीन मांगते हैं, तो राज्य सरकार इस पर विचार कर सकती है। हिंदू पक्ष ने अदालत में एक और महत्वपूर्ण मांग की थी कि राजा भोज की आराध्य देवी वाग देवी सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा को लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम से वापस लाने का आदेश दिया जाए। कोर्ट ने इस पर कहा कि याचिकाकर्ता सरकार को ज्ञापन दे सकते हैं और सरकार इस विषय पर विचार कर सकती है。
फैसले की चार प्रमुख बातें
1. धार्मिक चरित्र मंदिर: एएसआई के सर्वेक्षण, स्थापत्य विश्लेषण, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट ने परिसर का धार्मिक चरित्र सरस्वती मंदिर के रूप में मान्यता दी।
2. एएसआई रिपोर्ट का महत्व: रिपोर्ट में 94 मूर्तियां, 150 संस्कृत-प्राकृत शिलालेख और मंदिर शैली के स्तंभों का उल्लेख है। मुस्लिम पक्ष ने इसे पक्षपातपूर्ण बताया, जबकि एएसआई ने कहा कि यह सर्वेक्षण विशेषज्ञों की मदद से किया गया था।
3. प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट: मुस्लिम पक्ष ने 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का हवाला दिया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि संरक्षित स्मारक इस कानून के दायरे से बाहर हैं। भोजशाला 1904 से एक संरक्षित स्मारक है।
4. जैन पक्ष का दावा: जैन पक्ष ने परिसर को जैन मंदिर बताया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और पुरातात्विक सामग्री इसे जैन मंदिर घोषित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
हिंदू पक्ष की दलीलें
सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए कई ऐतिहासिक सबूत पेश किए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि यहां लंबे समय से वसंत पंचमी सहित अन्य अवसरों पर पूजा-अर्चना की परंपरा रही है।
मुस्लिम पक्ष की आपत्तियां
कोर्ट में एएसआई की सर्वे रिपोर्ट को मुस्लिम समुदाय ने पक्षपातपूर्ण बताया। उनका कहना था कि यह रिपोर्ट हिंदू पक्ष के दावों को मजबूत करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। एएसआई ने अदालत में कहा कि सर्वे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से किया गया है।
भोजशाला का ऐतिहासिक महत्व
भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि यहां मां सरस्वती का मंदिर और विद्या केंद्र था। दावा किया जाता है कि 12वीं-13वीं शताब्दी में मंदिर को ध्वस्त कर वहां मकबरा और मस्जिद का निर्माण किया गया। 18 मार्च 1904 से इसे संरक्षित स्मारक के रूप में दर्ज किया गया है। यह परिसर 1958 के प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल अधिनियम के तहत भी संरक्षित है। लंबे समय से यह विवाद बना हुआ था कि इस स्थल का धार्मिक स्वरूप क्या है। हिंदू पक्ष इसे देवी वाग देवी सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र मानता रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता रहा है। कहा जाता है कि यहां पर 1000 से 1055 ईस्वी तक राजा भोज ने शासन किया। राजा भोज सरस्वती देवी के बड़े भक्त थे। उन्होंने यहां 1034 ईस्वी में एक महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में भोजशाला के नाम से जाना जाने लगा। कुछ इतिहासकार यह भी कहते हैं कि 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने गौशाला को ध्वस्त कराया था। बाद में दिलावर खान गौरी ने 1401 ईस्वी में भोजशाला के एक हिस्से में मस्जिद बनवा दी और उसके बाद 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने बाकी बचे भाग पर भी मस्जिद बनवा दी। कोर्ट के आदेश पर एएसआई ने यहां पर 98 दिनों तक सर्वे भी करवाया था। परिसर से चांदी, तांबे, एलुमिनियम और स्टील के कुल 31 सिक्के पाए गए थे। ये सिक्के 10वीं-11वीं शताब्दी के इंडो-सेशियन काल, 13वीं-14वीं शताब्दी के दिल्ली सल्तनत और 15वीं-16वीं शताब्दी के मालवा सुल्तान और मुगल काल के समय के हैं। कुछ खिड़कियों और खंभों पर देवी-देवताओं या पशुओं की आकृतियां उकेरी हुई पाई गईं। जांच के दौरान कुल 94 मूर्तियां, मूर्ति कला के टुकड़े और वास्तु शिल्प देखे गए। खंभों की कुछ बीमों पर चार सशस्त्र देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई थीं, जिनमें गणेश, ब्रह्मा, नर्सिंग आदि की तस्वीरें शामिल हैं।