×

भारतीय सेना की नई रणनीतियाँ: भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयारी

भारतीय सेना के प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हाल ही में सेना की नई रणनीतियों और स्वदेशीकरण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सेना न केवल वर्तमान चुनौतियों का सामना कर रही है, बल्कि भविष्य के युद्ध के स्वरूपों के लिए भी तैयार हो रही है। नई इकाइयों का गठन और 'मेड इन इंडिया' उपकरणों का उपयोग आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। जानें कैसे भारतीय सेना तकनीक का उपयोग कर रही है और सैनिकों को संचालन के केंद्र में रख रही है।
 

सेना प्रमुख का बयान

गुरुवार को सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने बताया कि भारतीय सेना की सोच में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। यह न केवल मौजूदा चुनौतियों का सामना कर रही है, बल्कि भविष्य में युद्ध के विभिन्न स्वरूपों के लिए भी योजनाबद्ध तैयारी कर रही है। इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, सेना ने नई संरचनाएं स्थापित की हैं, जिन्हें जटिल परिचालन परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए तैयार किया जा रहा है।


नई इकाइयों का गठन

78वें सेना दिवस परेड के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जनरल द्विवेदी ने कहा कि इस परिवर्तन के तहत भैरव बटालियन, अश्विनी प्लाटून, शक्तिबान रेजिमेंट और दिव्यास्त्र बैटरी जैसी नई इकाइयां बनाई गई हैं। ये इकाइयां भविष्य की परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप चुस्त और मिशन-उन्मुख बलों के निर्माण के प्रयासों को दर्शाती हैं। इस यात्रा का मुख्य केंद्र आत्मनिर्भरता है, जो परेड के दौरान प्रदर्शित 'मेड इन इंडिया' उपकरणों से स्पष्ट है।


स्वदेशीकरण की आवश्यकता

भारतीय सेना के प्रमुख ने स्वदेशी हथियार प्रणालियों और उपकरणों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्वदेशीकरण अब एक रणनीतिक आवश्यकता बन गया है, जिससे परिचालन लचीलापन और दीर्घकालिक विश्वसनीयता में वृद्धि होती है। इसके साथ ही, हम ऐसे संसाधनों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो सैन्य और नागरिक दोनों उद्देश्यों के लिए उपयोगी हो सकें। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विकसित अवसंरचना और प्रौद्योगिकी का राष्ट्रीय विकास में योगदान देना आवश्यक है।


भविष्य के लिए तैयार बल

भारतीय सेना लगातार सशक्त सैनिकों, आधुनिक सहायक प्रणालियों और विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावी कार्य करने की क्षमता के साथ भविष्य के लिए तैयार बल के रूप में विकसित हो रही है। प्रौद्योगिकी का उपयोग निर्णय लेने और स्थितिजन्य जागरूकता को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है, जबकि सैनिक को संचालन के केंद्र में रखा जा रहा है।