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भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी में भारी गिरावट

भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी में भारी गिरावट आई है, जिससे निवेशकों के मन में चिंता बढ़ गई है। मार्च 2022 से मार्च 2026 के बीच, शीर्ष 10 शेयरों में विदेशी निवेश का हिस्सा 40.9% से घटकर 21.3% रह गया है। इस गिरावट का असर प्रमुख कंपनियों पर पड़ा है, जैसे एचडीएफसी, रिलायंस और इंफोसिस। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बिकवाली अब थमने लगी है, और भारतीय बाजारों में विदेशी निवेशकों की वापसी के संकेत मिल रहे हैं। जानें इस स्थिति के पीछे के कारण और भविष्य की संभावनाएं।
 

भारतीय शेयर बाजार में बदलाव

भारतीय शेयर बाजार में इस समय एक महत्वपूर्ण ढांचागत परिवर्तन हो रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारत की प्रमुख ब्लूचिप कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी को तेजी से घटाया है। आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2022 में जिन शीर्ष 10 शेयरों में विदेशी निवेशकों का 40.9% निवेश था, वह मार्च 2026 तक घटकर केवल 21.3% रह गया है। इसका मतलब है कि पिछले चार वर्षों में इन दिग्गज कंपनियों में FIIs का निवेश लगभग आधा हो गया है। इस स्थिति में आम निवेशकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह उनके निवेश पोर्टफोलियो के लिए खतरा है?


विदेशी निवेशकों की बिकवाली का प्रभाव

विदेशी निवेशकों की इस व्यापक बिकवाली का असर बाजार की अधिकांश प्रमुख कंपनियों पर पड़ा है। सबसे अधिक नुकसान उन बड़े शेयरों को हुआ है जो कभी विदेशी पोर्टफोलियो का मुख्य आधार थे। एचडीएफसी और एचडीएफसी बैंक के विलय के बाद बनी नई इकाई में FIIs की हिस्सेदारी 11.6% से घटकर 6.9% हो गई है। इसी तरह, रिलायंस इंडस्ट्रीज में उनकी हिस्सेदारी 9.1% से घटकर 5.3% रह गई है। दिग्गज आईटी कंपनी इंफोसिस में यह गिरावट 5.8% से सीधे 2.1% और टीसीएस में 4.2% से घटकर केवल 1.3% पर पहुंच गई है। हिंदुस्तान यूनिलीवर, एशियन पेंट्स और टेक महिंद्रा जैसे सुरक्षित माने जाने वाले शेयरों में भी विदेशी निवेशकों ने अपनी स्थिति को न्यूनतम स्तर पर ला दिया है।


डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी

सतह पर देखने पर निफ्टी ने मार्च 2022 से मई 2026 के बीच रुपये के संदर्भ में लगभग 35% का रिटर्न दिया है, जो संतोषजनक लगता है। लेकिन विदेशी निवेशकों के दृष्टिकोण से, डॉलर के मुकाबले रुपये में आई 27-28% की गिरावट ने इस लाभ को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। इस कारण, विदेशी निवेशकों के लिए डॉलर में वास्तविक रिटर्न बहुत कम रह गया है। इसके विपरीत, अमेरिकी बाजार के एसएंडपी 500 इंडेक्स ने एआई बूम के चलते डॉलर में 60% से अधिक का रिटर्न दिया है।


आईटी और बैंकिंग सेक्टर पर प्रभाव

यह केवल भारत के भीतर एक सेक्टर से दूसरे सेक्टर में धन का स्थानांतरण नहीं है। वास्तव में, यह वैश्विक स्तर पर फंड्स को अन्य देशों में ले जाने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। इस दौड़ में भारत फिलहाल ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों से पीछे है, जहां सेमीकंडक्टर चिप्स और एआई आधारित तकनीकी विकास विदेशी निवेशकों को अधिक आकर्षित कर रहे हैं। आईटी सेक्टर पर सबसे गहरा असर पड़ा है। इंफोसिस, टीसीएस, एचसीएल टेक और टेक महिंद्रा जैसी कंपनियों में FIIs की हिस्सेदारी 12.4% से घटकर केवल 4.7% रह गई है।


विदेशी फंड्स की वापसी के संकेत

हालांकि, बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों की इस बिकवाली में थकान के संकेत दिखाई देने लगे हैं। हाल के कुछ कारोबारी सत्रों में भूराजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारतीय बाजारों में सकारात्मक विदेशी निवेश देखा गया है। इसे पूरी तरह से विदेशी निवेशकों की वापसी नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह एक 'टैक्टिकल रीएंट्री' की शुरुआत हो सकती है। रिटेल निवेशकों के लिए सलाह है कि वे घबराने के बजाय अपने पोर्टफोलियो की कंपनियों के बुनियादी व्यवसाय और कमाई पर ध्यान दें।