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भारतीय रुपये की मजबूती के लिए सरकार का बड़ा कदम

हाल के महीनों में विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से धन निकासी के चलते, सरकार और आरबीआई ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इस निर्णय के परिणामस्वरूप भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूती आई है। सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर टैक्स में छूट देने का ऐलान किया है। इस कदम से रुपये की गिरावट थमने की उम्मीद है और विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ने की संभावना है।
 

सरकार और आरबीआई का ऐलान

नई दिल्ली। हाल के महीनों में विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजारों से धन निकासी को देखते हुए, सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। यह कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। इस निर्णय के परिणामस्वरूप अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में उल्लेखनीय मजबूती आई है.


निवेशकों को लुभाने की कोशिश

सरकार और आरबीआई की यह पहल रुपये को मजबूत करने और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के उद्देश्य से की गई है। सरकारी सहमति से, आरबीआई ने विदेशी संस्थागत निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों, यानी GSecs में निवेश करने पर 'कैपिटल गेन्स टैक्स' में छूट देने की घोषणा की है. इस तरह के निर्णय की उम्मीद पहले से ही की जा रही थी.


बॉन्ड टैक्स में कटौती

इस प्रस्ताव के अनुसार, विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बॉंड से प्राप्त ब्याज पर 20% टैक्स को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार के अनुरूप टैक्स संरचना बनाना है, ताकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय डेट मार्केट में अधिक निवेश कर सकें.


रुपये में तेजी

इस घोषणा के साथ ही, शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में अचानक तेजी देखी गई। सरकार के इस कदम के बाद, शुरुआती कारोबार में रुपये ने 50 पैसे की मजबूती के साथ 95.24 के स्तर पर पहुंच गया था, जबकि दोपहर 1 बजे यह 95.37 के स्तर पर कारोबार कर रहा था. विश्लेषकों का मानना है कि इस टैक्स छूट के बाद भारतीय डेट मार्केट में विदेशी पूंजी का प्रवाह तेजी से बढ़ेगा.


सरकार का यह कदम क्यों आवश्यक था?

इस वर्ष की शुरुआत से भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ता जा रहा था। 2026 के प्रारंभ से अब तक, रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 5% से अधिक की गिरावट आई है। इस गिरावट के पीछे मुख्यतः दो कारण हैं:


1. कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि के कारण भारत का आयात बिल बढ़ गया है, जिससे डॉलर की मांग में वृद्धि हुई है.


2. इक्विटी मार्केट से विदेशी फंड्स की निकासी: विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगातार धन निकाल रहे थे, जिससे घरेलू बाजार से डॉलर बाहर जा रहा था.


भविष्य की संभावनाएं

विशेषज्ञों के अनुसार, इस निर्णय से न केवल रुपये की गिरावट रुकेगी, बल्कि भारतीय बॉंड मार्केट में विदेशी निवेशकों की भागीदारी भी बढ़ेगी। सरकार को उम्मीद है कि इस कदम से विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी और चालू खाता घाटे को संतुलित करने में मदद मिलेगी. यदि विदेशी पूंजी का प्रवाह इसी तरह बना रहा, तो रुपये में और अधिक स्थिरता देखने को मिल सकती है.