भारत में प्रजनन दर में भिन्नता: उत्तर बनाम दक्षिण
भारत में प्रजनन दर में गिरावट
भारत में प्रजनन दर में गिरावट देखी जा रही है। आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में फर्टिलिटी रेट अपेक्षाकृत बेहतर है। इसके विपरीत, दिल्ली और दक्षिणी राज्यों में यह स्थिति चिंताजनक है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में यह दर घटती जा रही है, लेकिन कुछ राज्यों में स्थिति अभी भी संतोषजनक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2023-24 के आंकड़े इस बदलाव की कहानी बयां करते हैं। फर्टिलिटी रेट का अर्थ है कि एक महिला अपने जीवन में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में यह दर अधिक है, जबकि दिल्ली, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह काफी कम है। आइए, समझते हैं कि इसके पीछे के कारण क्या हैं।
उत्तर भारत में फर्टिलिटी रेट अधिक होने के कारण
1- शिक्षा की कमी
जहां महिलाओं की शिक्षा का स्तर कम होता है, वहां प्रजनन दर अधिक होती है। यह जागरूकता की कमी से जुड़ा है। कम शिक्षित महिलाएं परिवार नियोजन और मातृ स्वास्थ्य के लाभों के बारे में कम जानती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के कई क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा अधूरी रह जाती है। जब लड़कियां जल्दी पढ़ाई छोड़ती हैं, तो उनकी शादी भी जल्दी हो जाती है, जिससे बच्चे भी जल्दी होते हैं। शिक्षा से सोच में बदलाव आता है और परिवार का आकार छोटा होता है।
2- जल्दी शादी और मातृत्व
इन राज्यों में कई क्षेत्रों में कम उम्र में शादी की परंपरा अभी भी प्रचलित है। जब शादी जल्दी होती है, तो महिलाओं का प्रजनन काल लंबा हो जाता है, जिससे बच्चों की संख्या बढ़ने की संभावना होती है। कई परिवारों में शादी के तुरंत बाद बच्चे की उम्मीद की जाती है, जिससे परिवार नियोजन पर खुलकर चर्चा नहीं हो पाती।
3- गरीबी और बच्चों को सहारा मानने की सोच
गरीब परिवारों में बच्चे अक्सर आर्थिक सहारा माने जाते हैं। गांवों में यह सोच अधिक प्रचलित है। लोग मानते हैं कि अधिक बच्चे घर के कामों और कमाई में मदद करेंगे। हालांकि, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के साथ यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है।
4- परिवार नियोजन सेवाओं की सीमित पहुंच
परिवार नियोजन की सेवाएं कई पिछड़े इलाकों में कमजोर हैं। कई महिलाएं गर्भनिरोधक साधनों के बारे में जानकारी नहीं रखतीं। कुछ स्थानों पर सामाजिक दबाव के कारण उनका उपयोग नहीं हो पाता।
5- बेटे की चाह
उत्तर भारत के कई हिस्सों में बेटे को परिवार का वारिस माना जाता है। यदि पहले एक या दो बेटियां हो जाएं, तो परिवार बेटा होने तक बच्चे पैदा करता रहता है। यह सामाजिक और मानसिक कारणों से भी जुड़ा है।
दक्षिण भारत में फर्टिलिटी रेट कम होने के कारण
1- बेहतर शिक्षा
दिल्ली और दक्षिण भारत के राज्यों में शिक्षा का स्तर बेहतर है। जब महिलाएं अधिक पढ़ाई करती हैं, तो वे अपने स्वास्थ्य और परिवार के बारे में सोच-समझकर निर्णय लेती हैं।
2- शहरी जीवन और महंगा खर्च
दिल्ली और दक्षिणी राज्यों में शहरीकरण के कारण जीवन का खर्च बढ़ गया है। लोग समझते हैं कि अधिक बच्चों की अच्छी परवरिश करना मुश्किल है।
3- महिलाओं की नौकरी
महिलाओं की नौकरी में भागीदारी बढ़ने से उनकी प्राथमिकताएं बदलती हैं। वे योजना बनाकर परिवार चाहती हैं।
4- स्वास्थ्य सेवाएं
दक्षिण भारत में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हैं, जिससे लोग कम बच्चों की परवरिश को लेकर आश्वस्त होते हैं।
5- सामाजिक सोच में बदलाव
दिल्ली और दक्षिणी राज्यों में लोग जीवन की गुणवत्ता पर जोर देते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चों को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य मिले।
क्या यह अंतर हमेशा रहेगा?
नहीं, यह अंतर हमेशा एक जैसा नहीं रहेगा। भारत में धीरे-धीरे सभी राज्यों में फर्टिलिटी रेट कम हो रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के साथ बदलाव आ रहा है।