भारत में नाश्ते की परंपरा: एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण
नाश्ते का महत्व और भारतीय परंपरा
भोजन को आमतौर पर तीन भागों में बांटा जाता है: सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना। इनमें से नाश्ते को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है। विशेषज्ञों और चिकित्सकों का मानना है कि सुबह का नाश्ता कभी नहीं छोड़ना चाहिए, और यह भी जरूरी है कि यह पोषक तत्वों से भरपूर हो ताकि दिन की शुरुआत ऊर्जा के साथ हो सके। लेकिन भारतीय संस्कृति में नाश्ते का कोई स्पष्ट विचार नहीं था। यह जानकारी प्रसिद्ध खाद्य समीक्षक और इतिहासकार पुष्पेश पंत ने साझा की है।
भारतीय घरों में भोजन की आदतें
पुष्पेश पंत के अनुसार, पहले के समय में भारतीय परिवारों में भोजन केवल दो बार होता था। सुबह और शाम को चूल्हा जलता था, और लोग सुबह जो भी खाना मिल जाता था, उसे खाकर अपने काम पर निकल जाते थे। चाहे वह बासी रोटी हो या ताजा खाना, लोग वही खाकर खेतों में काम करने जाते थे।
नाश्ते का आगमन
पंत के अनुसार, नाश्ते का विचार अंग्रेजों के आगमन के साथ भारत में आया। उन्होंने एक ऐसा भोजन तैयार किया जिसे बच्चे स्कूल में टिफिन के रूप में ले जा सकते थे। इस प्रकार, सुबह का नाश्ता धीरे-धीरे ब्रंच का रूप ले लिया। नाश्ते में डबल रोटी, अंडा पराठा, रोटी सब्जी, दूध, दही और चूड़ी जैसी चीजें शामिल थीं।
भोजन की आदतों में बदलाव
पुष्पेश पंत बताते हैं कि पहले भारतीय किसान सुबह घर से निकलने से पहले भरपेट खाना खाते थे। पहाड़ी क्षेत्रों में सुबह भात दाल बनती थी, जिसे खाकर लोग काम पर जाते थे। लंच का कोई विचार नहीं था, केवल सुबह और शाम का भोजन होता था।
करी का इतिहास
पंत के अनुसार, अंग्रेजों के आने से पहले 'करी' नामक कोई व्यंजन नहीं था। मटन करी, फिश करी और चिकन करी जैसे व्यंजन अंग्रेजों ने बनाए। यह जानकारी पुष्पेश पंत ने साझा की है, जो एक प्रसिद्ध खाद्य समीक्षक और इतिहासकार हैं।