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भारत ने बांग्लादेश की कश्मीर संबंधी हरकत पर सख्त प्रतिक्रिया दी

भारत ने बांग्लादेश की कश्मीर संबंधी हरकत पर सख्त प्रतिक्रिया दी है, जब बांग्लादेश के पूर्व राजदूत ने एक नक्शा प्रस्तुत किया जिसमें कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया। इस घटना के बाद, भारत ने अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाए हैं। बांग्लादेश और चीन के बीच तीस्ता नदी परियोजना को लेकर बढ़ती नजदीकियां भारत की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौती बन सकती है।
 

बांग्लादेश की विवादास्पद प्रस्तुति पर भारत की कड़ी प्रतिक्रिया

कश्मीर के संदर्भ में बांग्लादेश की एक विवादास्पद हरकत पर भारत ने तुरंत और सख्त प्रतिक्रिया दी है, यह स्पष्ट करते हुए कि जम्मू-कश्मीर पर किसी भी प्रकार की गलतफहमी या भ्रामक जानकारी को सहन नहीं किया जाएगा। ढाका में आयोजित एक विदेश नीति संगोष्ठी के दौरान, बांग्लादेश के पूर्व राजदूत तारिक ए करीम ने एक ऐसा नक्शा प्रस्तुत किया जिसमें कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया था। इस पर भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। ढाका में भारतीय उच्चायोग की द्वितीय सचिव पूजा कुमारी झा ने स्पष्ट रूप से कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और प्रस्तुत नक्शा पूरी तरह से गलत है। भारत की इस कड़ी प्रतिक्रिया ने यह संदेश दिया कि नई दिल्ली किसी भी मंच पर अपनी संप्रभुता से जुड़ी किसी भी छेड़छाड़ को बर्दाश्त नहीं करेगी。


तारिक ए करीम की सफाई और चीन के साथ बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकियां

हालांकि विवाद बढ़ने पर तारिक ए करीम ने कहा कि नक्शा केवल प्रतीकात्मक था और वास्तविक सीमाओं को नहीं दर्शाता, लेकिन भारत इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब बांग्लादेश और चीन के बीच तीस्ता नदी परियोजना को लेकर बढ़ती नजदीकियां भारत की रणनीतिक चिंताओं को और बढ़ा रही हैं।


तीस्ता नदी परियोजना और भारत की सुरक्षा चिंताएं

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच तीस्ता नदी के व्यापक प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना पर समझौता हुआ है। यह परियोजना केवल नदी प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से चीन बांग्लादेश में अपने रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाना चाहता है। तीस्ता नदी सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश पहुंचती है और भारत के संवेदनशील सिलीगुडी गलियारे के निकट बहती है। यही कारण है कि भारत इस परियोजना को जल प्रबंधन से अधिक, राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मानता है।


चीन की भूमिका और भारत की चिंताएं

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन समर्थित यह परियोजना भविष्य में भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौती बन सकती है। तीस्ता नदी कई स्थानों पर भारत की सीमा से केवल दस से बारह किलोमीटर की दूरी पर बहती है, और यह क्षेत्र सिलीगुडी गलियारे के निकट स्थित है। यदि इस क्षेत्र में अस्थिरता या बाहरी दखल बढ़ता है, तो इसका सीधा असर भारत की सामरिक सुरक्षा पर पड़ सकता है।


बांग्लादेश की विशाल परियोजना और चीन का सहयोग

तीस्ता परियोजना का आकार भी बहुत बड़ा है। बांग्लादेश इस योजना के तहत लगभग चौदह करोड़ घन मीटर गाद निकालने की योजना बना रहा है। इसके अलावा, 171 वर्ग किलोमीटर भूमि पुनः प्राप्त करने, बयासी घाट बनाने और 224 किलोमीटर सड़क नेटवर्क विकसित करने की योजना है। बांग्लादेश का दावा है कि इससे बाढ़ नियंत्रण, कृषि उत्पादन और रोजगार में सुधार होगा।


भारत और बांग्लादेश के बीच जल बंटवारे का गतिरोध

बांग्लादेश ने चीन का साथ क्यों चुना, इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला, इतनी विशाल परियोजना के लिए भारी वित्तीय निवेश और तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है, जिसमें चीन अग्रणी है। दूसरा, भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे को लेकर वर्षों से गतिरोध बना हुआ है। बांग्लादेश लंबे समय से नदी के पानी में अधिक हिस्सेदारी की मांग कर रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल की आपत्तियों के कारण कोई समझौता नहीं हो पाया।


भारत की स्थिति और भविष्य की चुनौतियां

भारत ने अब भी अपना रुख स्पष्ट रखा है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा है कि भारत गंगा और तीस्ता सहित सभी जल समझौतों पर बांग्लादेश के साथ बातचीत जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी कहा है कि भारत ने तीस्ता परियोजना को लेकर अपनी चिंताएं ढाका तक पहुंचा दी हैं और नई दिल्ली इस मामले से जुड़े हर घटनाक्रम पर नजर रख रही है।


दक्षिण एशिया की राजनीति में नया मोड़

कश्मीर पर बांग्लादेश की हरकत और तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती घुसपैठ ने दक्षिण एशिया की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अपनी संप्रभुता और रणनीतिक हितों पर किसी भी प्रकार की चोट बर्दाश्त नहीं करेगा। आने वाले समय में, तीस्ता केवल जल बंटवारे का विवाद नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत, चीन और बांग्लादेश के बीच रणनीतिक शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।