भारत-चीन संबंध: नेहरू के समय की कूटनीति और सुरक्षा परिषद में चीन का समर्थन
भारत और चीन के रिश्तों की जटिलता
चीन हमेशा से वैश्विक स्तर पर एक रहस्य बना रहा है। भारत, जो अपने पड़ोसी देश को एक बड़े भाई के रूप में देखता है, नेहरू से लेकर मोदी तक, इसे समझने में असफल रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि चीन की कम्युनिस्ट सरकार की बातें और कार्यों में बड़ा अंतर है। पिछले 74 वर्षों में, चीन के नेताओं ने भारत को कई बार धोखा दिया है। भारत के कई प्रधानमंत्रियों ने, जैसे नेहरू, राजीव गांधी, और मोदी, ने चीन के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की, लेकिन परिणाम सभी को ज्ञात हैं। एक प्रसिद्ध कहावत है कि चीन ने किसी को नहीं बख्शा। भारत ने हमेशा चीन से दोस्ती की कोशिश की। नेहरू का मानना था कि दोनों देशों में बहुत समानताएँ हैं और वे अच्छे मित्र बन सकते हैं।
सुरक्षा परिषद में घटनाक्रम
द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई, जिसमें सुरक्षा परिषद प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर निर्णय लेने वाली संस्था बनी। इसके पांच स्थायी सदस्य हैं: अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस और चीन। 1949 में चीन में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया, जब कम्युनिस्ट सरकार ने सत्ता संभाली। माओत्से तुंग ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की, जिससे गृहयुद्ध समाप्त हुआ। इस समय भारत ने अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाने की कोशिश की।
अमेरिका का प्रस्ताव
1950 में अमेरिका ने भारत से संपर्क किया, जिसमें 'रिपब्लिक ऑफ चाइना' को हटाकर भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता देने का प्रस्ताव रखा। विजयलक्ष्मी पंडित ने नेहरू को इस बारे में जानकारी दी। नेहरू ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह चीन का अपमान होगा और इससे भारत-चीन संबंधों में दरार आएगी।
सोवियत संघ का प्रस्ताव
1955 में सोवियत नेता निकोलाई बुल्गानिन ने नेहरू को बताया कि वे भारत को सुरक्षा परिषद का छठा सदस्य बनाने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, नेहरू ने इसे भी ठुकरा दिया, यह कहते हुए कि इसके लिए चार्टर में संशोधन की आवश्यकता होगी।
नेहरू की कूटनीति
नेहरू ने अमेरिका की भू-राजनीतिक रणनीति के कारण भारत को किसी पड़ोसी देश के साथ संघर्ष में नहीं उलझाना चाहा। उन्होंने चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने का समर्थन किया, यह मानते हुए कि इससे वैश्विक स्थिरता बनी रहेगी। उनका मानना था कि यदि चीन को अलग-थलग किया गया, तो इससे युद्ध की संभावना बढ़ सकती है।