भारत के सेमीकंडक्टर मिशन पर होर्मुज संकट का प्रभाव
सेमीकंडक्टर मिशन पर नई चुनौतियाँ
भारत को होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और उर्वरक की कमी की चिंताओं का सामना करना पड़ रहा है। ईरान और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष ने भारत के सेमीकंडक्टर मिशन पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं डाला है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि आवश्यक क्षेत्रों में दबाव बढ़ रहा है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस संकट के कारण सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के अगले चरण में देरी की संभावना नहीं है।
इसका मतलब यह है कि नीति स्तर पर काम जारी है, लेकिन कार्य वातावरण में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। इस मिशन के लिए सबसे बड़ी चुनौती हीलियम जैसी विशेष गैसों की कमी है, जो सेमीकंडक्टर निर्माण में आवश्यक है। दुनिया में हीलियम का बड़ा हिस्सा कतर से आता है, लेकिन होर्मुज के बंद होने से एशिया में इसकी आपूर्ति में कमी आई है।
हीलियम गैस की आपूर्ति पर संकट
एचएफएस रिसर्च के सीईओ फिल फेर्श्ट के अनुसार, यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत के चिप पैकेजिंग क्षेत्र पर कुछ हफ्तों में प्रभाव पड़ सकता है। आमतौर पर कंपनियों के पास 4 से 8 हफ्तों का स्टॉक होता है, लेकिन सभी जगह स्थिति समान नहीं है। उन्होंने बताया कि असली समस्या हर गैस में नहीं, बल्कि हीलियम जैसे विशेष संसाधनों में है। कंपनियाँ कुछ समय तक काम कर सकती हैं, लेकिन जल्द ही उन्हें प्राथमिकता के आधार पर उत्पादन करना होगा।
यदि पश्चिम एशिया में यह संकट एक महीने से अधिक समय तक चलता है, तो भारत की चिप पैकेजिंग उद्योग पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। प्रारंभ में लागत बढ़ेगी और कार्य में देरी होगी, लेकिन बाद में उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है।
पेट्रोकेमिकल क्षेत्र पर भी प्रभाव
दूसरा बड़ा प्रभाव पेट्रोकेमिकल क्षेत्र पर पड़ रहा है। खाड़ी क्षेत्र नाफ्था और उससे बनने वाले उत्पादों का एक प्रमुख स्रोत है, जो चिप पैकेजिंग और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड बनाने में उपयोग होते हैं। सप्लाई में कमी के कारण एशिया में इनकी कमी के संकेत मिल रहे हैं। भारत की स्थिति चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि वह कई आवश्यक कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है। फेर्श्ट के अनुसार, यदि यह संकट लंबा चलता है तो लागत बढ़ेगी, सप्लाई में देरी होगी और कुछ स्थानों पर कमी भी हो सकती है।
AI इंफ्रास्ट्रक्चर में वृद्धि में कठिनाई
तीसरा और सबसे बड़ा प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ सकता है। सेमीकंडक्टर निर्माण, चिप पैकेजिंग और डेटा सेंटर सभी में भारी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। कच्चे तेल और LNG की कीमतों में वृद्धि से लागत भी बढ़ रही है।
फेर्श्ट ने कहा कि इससे भारत के लिए AI इंफ्रास्ट्रक्चर को कम लागत पर बढ़ाना मुश्किल हो जाएगा। भले ही तुरंत कीमतें न बढ़ें, लेकिन बिजली की लागत में वृद्धि होगी और उत्पादन पर दबाव आएगा। उन्होंने कहा कि आगे चलकर कीमतों में बढ़ोतरी, मुनाफे में कमी और विस्तार योजनाओं में देरी देखने को मिल सकती है।
डेटा सेंटर के विकास पर भी संकट
काउंटर प्वाइंट के तरुण पाठक का कहना है कि यदि ऊर्जा की कीमतें बढ़ती रहीं, तो मांग पर भी असर पड़ेगा। विशेष रूप से डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में, जहां ऊर्जा की खपत अधिक होती है, वहां निवेश और मांग दोनों में कमी आ सकती है। इसका प्रभाव भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और AI क्षेत्र पर भी पड़ सकता है, जहां विकास काफी हद तक निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करता है।
हालांकि, सरकार की सेमीकंडक्टर योजना अपने मार्ग पर है, लेकिन होर्मुज संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत कई महत्वपूर्ण चीजों के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भर है। भविष्य में कच्चे माल की अनिश्चितता, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और मांग में संभावित कमी सबसे बड़ी चुनौतियाँ होंगी।
फेर्श्ट के अनुसार, यह संकट भारत के चिप क्षेत्र को पूरी तरह से रोक नहीं पाएगा, लेकिन इसकी गति को धीमा कर सकता है और उत्पादन तथा निवेश पर प्रभाव डाल सकता है। कुल मिलाकर, भारत का सेमीकंडक्टर मिशन आगे बढ़ रहा है, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों ने इसकी राह को और अधिक जटिल बना दिया है.