भारत की विदेश नीति में संवाद का महत्व: एस. जयशंकर
विदेश मंत्री का संवाद पर जोर
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शुक्रवार को बताया कि भारत के इरादों को गलत तरीके से समझने से बचने के लिए अन्य देशों के साथ प्रभावी संवाद स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है।
आईआईटी मद्रास में छात्रों के साथ एक संवाद सत्र में भाग लेते हुए, जयशंकर ने कहा, "लोगों को आपको गलत समझने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका संवाद है। यदि आप स्पष्ट, ईमानदार और प्रभावी तरीके से संवाद करते हैं, तो अन्य देश और लोग इसे मानते हैं और स्वीकार करते हैं।"
उन्होंने आगे कहा, "दुनिया भर में कई लोग अपनी संस्कृति, परंपरा और विरासत पर गर्व करते हैं। मुझे नहीं लगता कि हमें ऐसा करने में कोई संकोच होना चाहिए।" जयशंकर ने यह भी कहा कि "बहुत कम प्राचीन सभ्यताएं आज प्रमुख आधुनिक राष्ट्रों के रूप में मौजूद हैं, और भारत उनमें से एक है। हमारे पास अपने अतीत की एक गहरी समझ है, जो बहुत से देशों के पास नहीं है। यह लोकतांत्रिक राजनीतिक मॉडल को अपनाने का हमारा निर्णय था, जिसने लोकतंत्र के विचार को एक वैश्विक राजनीतिक अवधारणा बना दिया।"
उन्होंने यह भी कहा, "यदि हमने यह मार्ग नहीं चुना होता, तो लोकतांत्रिक आदर्श केवल क्षेत्रीय और संकीर्ण रह जाता। पश्चिम के साथ साझेदारी भी महत्वपूर्ण है, और इसी तरह हम दुनिया को आकार देते हैं।"
जयशंकर ने बताया कि देशों ने घरेलू विकास के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ाव के माध्यम से प्रगति की है और अंतरराष्ट्रीय परिवेश का उपयोग करके लाभ प्राप्त किया है।
उन्होंने कहा, "जब हम 'वसुधैव कुटुंबकम' कहते हैं, तो इसका अर्थ है कि हमने कभी भी दुनिया को शत्रुतापूर्ण या प्रतिकूल स्थान के रूप में नहीं देखा। हमारे संसाधन सीमित हैं। सीमित संसाधनों के साथ अधिकतम प्रभाव डालने की चुनौती का समाधान करना आवश्यक है।"
जयशंकर ने कहा, "आज भारतीय विदेश नीति और कूटनीति में हम इसी चुनौती का समाधान करने का प्रयास कर रहे हैं। हम अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता और ताकत का उपयोग करते हुए और अन्य संस्थानों व संभावनाओं का लाभ उठाते हुए ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं।"