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भारत का अनोखा शाकाहारी मगरमच्छ: बबिआ की कहानी

भारत में एक अनोखा शाकाहारी मगरमच्छ बबिआ है, जो केवल प्रसाद खाता है और केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर की सुरक्षा करता है। यह मगरमच्छ 60 वर्षों से मंदिर के तालाब में निवास कर रहा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब एक मगरमच्छ की मृत्यु होती है, तो दूसरा रहस्यमय तरीके से प्रकट हो जाता है। जानिए इस अद्भुत जीव की कहानी और मंदिर की ऐतिहासिकता के बारे में।
 

शाकाहारी मगरमच्छ का रहस्य


जीवन के कई पहलुओं में ऐसे तथ्य होते हैं जो हमें चौंका देते हैं। भारत में कुछ स्थानों की मान्यताएँ ऐसी हैं, जिनके बारे में केवल स्थानीय लोग ही जानते हैं।


आज हम एक ऐसी मान्यता के बारे में चर्चा करेंगे, जिसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। आमतौर पर जानवर मांसाहारी होते हैं, और मगरमच्छ जैसे विशाल और खतरनाक जीव भी मांस का सेवन करते हैं। लेकिन, एक ऐसा मगरमच्छ भी है जो पूरी तरह से शाकाहारी है। यह अद्भुत मगरमच्छ केवल प्रसाद खाता है।


इस शाकाहारी मगरमच्छ के बारे में जानने की जिज्ञासा हर किसी में है। यह मगरमच्छ केरल के प्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर के तालाब में निवास करता है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और तालाब मंदिर के बीच स्थित है। इस मगरमच्छ का नाम बबिआ है, और यह मंदिर की सुरक्षा करता है।


बबिआ के बारे में यह भी कहा जाता है कि जब इस तालाब में एक मगरमच्छ की मृत्यु होती है, तो रहस्यमय तरीके से दूसरा मगरमच्छ प्रकट हो जाता है।


मंदिर में चढ़ाए गए प्रसाद को बबिआ को खिलाने की अनुमति केवल पुजारियों को होती है। यह शाकाहारी मगरमच्छ तालाब के अन्य जीवों को नुकसान नहीं पहुंचाता।


बबिआ का रहस्य

यह मगरमच्छ अनंतपुर मंदिर की झील में लगभग 60 वर्षों से निवास कर रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि 1945 में अंग्रेजों ने इसे गोली मारकर मार डाला था, लेकिन अगले दिन यह फिर से प्रकट हो गया। यह सच है कि यह एक अनोखा शाकाहारी मगरमच्छ है।


पद्मनाभस्वामी मंदिर, जो भारत के सबसे धनी मंदिरों में से एक है, भगवान विष्णु को समर्पित है। कहा जाता है कि यहाँ भगवान विष्णु स्वयंभू रूप में विराजमान हैं। हजारों भक्त दूर-दूर से यहाँ आते हैं।


किवदंती है कि इस मंदिर में इंद्र और चंद्र ने भी भगवान पद्मनाभस्वामी की पूजा की थी। यहाँ 12008 शालिग्राम स्थापित हैं। घंटी, शंखनाद और मंत्रों की पवित्र ध्वनि भक्तों को आकर्षित करती है। यह मंदिर वैष्णवों के 108वें तीर्थ स्थल के रूप में भी जाना जाता है।


कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर 5000 साल पुराना है।


ताड़ पत्रों पर लिखे गए प्राचीन ग्रंथ अनंत्सयाना महात्म्य में इस मंदिर की स्थापना का उल्लेख है। मंदिर का पुनर्निर्माण कई बार हुआ है, और अंतिम बार 1733 में त्रावनकोर के महाराजा मार्तड वर्मा द्वारा किया गया था।