बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव: नीतीश कुमार का राज्यसभा नामांकन
बिहार में राजनीतिक हलचल
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा में नामांकन के साथ ही राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहे हैं। यह संकेत है कि नीतीश कुमार का तीन दशकों का राजनीतिक सफर अब समाप्त होने वाला है। हाल ही में, बिहार में राजनीतिक गतिविधियों के बीच गवर्नर का भी बदलाव किया गया। होली के दिन (4 मार्च) जब पूरा देश रंगों में डूबा था, बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई। 2005 से मुख्यमंत्री पद पर काबिज नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा जोर पकड़ने लगी, जिसके चलते जदयू में बैठकें भी आयोजित की गईं।
नीतीश कुमार का नामांकन
5 मार्च को, मुख्यमंत्री आवास के बाहर और जदयू कार्यालय में नीतीश कुमार के समर्थकों ने उनके निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इसी बीच, केंद्रीय गृह मंत्री पटना पहुंचे और नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल किया। 20 वर्षों से बिहार की सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार के इस अध्याय का अंत इस तरह होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। कुछ लोगों ने इस निर्णय को सही ठहराया, जबकि अन्य ने इसे दबाव में लिया गया निर्णय बताया।
JDU में विरोध और सत्ता परिवर्तन
जदयू के कई प्रमुख नेताओं ने पार्टी के भीतर ही विरोध शुरू कर दिया। नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को 5 मार्च को जदयू में शामिल होना था, लेकिन वह भी नहीं हो सका। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और बिहार में सत्ता परिवर्तन पर बीजेपी पर हमला बोला, यह कहते हुए कि बीजेपी ने '25 से 30 फिर से नीतीश' कहकर धोखा दिया।
बिहार की राजनीति पर नजरें
देर रात एक और राजनीतिक घटना घटी, जिसमें बिहार के राज्यपाल को बदल दिया गया। अब भारतीय सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी सैयद अता हसनैन को बिहार का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है। साथ ही, बिहार बीजेपी के प्रमुख नेता नंद किशोर यादव को नागालैंड का राज्यपाल बनाया गया है। अचानक बिहार की राजनीति में इस तरह की हलचल ने न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में चर्चा का विषय बना दिया है कि अब आगे क्या होने वाला है।