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पाकिस्तान की कूटनीति की असफलता और आर्थिक संकट

पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की, लेकिन उसकी कूटनीति विफल रही। देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है, और तेल की भारी कमी ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। जानें कैसे इस्लामाबाद की योजनाएँ ध्वस्त हुईं और क्या यह देश अपनी क्षमता से अधिक बड़ा खेल खेलने की कोशिश कर रहा है।
 

पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौतियाँ

पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की, लेकिन उसे पहले अपने आंतरिक मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए था। न तो ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम हुआ और न ही पाकिस्तान अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को बचा सका। इसके विपरीत, देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। पाकिस्तान में तेल की भारी कमी हो गई है और जो तेल उपलब्ध है, उसकी कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि आम जनता परेशान है।


ईरान की प्रतिक्रिया और पाकिस्तान की स्थिति

इस्लामाबाद की कूटनीति का असली चेहरा तब सामने आया जब ईरान ने अचानक ऐसा कदम उठाया जिसने पाकिस्तान की सारी योजनाओं को ध्वस्त कर दिया। जिस मंच पर पाकिस्तान ने खुद को वैश्विक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, वही मंच उसकी कमजोर रणनीति को उजागर कर गया। पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया, लेकिन यह संतुलन अब टूटता नजर आ रहा है।


वार्ता की विफलता

ईरान-अमेरिका वार्ता को ऐतिहासिक पहल माना गया था, लेकिन यह प्रारंभिक दौर में ही विफल हो गई। 21 घंटे की बातचीत के बावजूद मतभेद कम नहीं हुए। पाकिस्तान ने अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए दूसरे दौर की वार्ता का प्रयास किया, लेकिन ईरान के विदेश मंत्री ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से मिलने से मना कर दिया। यह पाकिस्तान की महत्वाकांक्षा पर सीधा प्रहार था।


आर्थिक संकट की गहराई

पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति भी तेजी से बिगड़ रही है। सुरक्षा इंतजाम, बार-बार के लॉकडाउन और आर्थिक गतिविधियों का ठप होना यह दर्शाता है कि यह प्रयोग देश पर भारी पड़ रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्वीकार किया है कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सीधा असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।


वैश्विक तेल संकट

वैश्विक स्तर पर तेल संकट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। मध्य पूर्व में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री ने बताया कि देश के पास केवल पांच से सात दिनों का कच्चा तेल भंडार है।


पाकिस्तान की आर्थिक नीतियाँ

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर निर्भरता के कारण पाकिस्तान के पास नीतिगत लचीलापन सीमित है। सरकार को पेट्रोल और डीजल पर कर लगाने पड़े हैं, लेकिन बढ़ती कीमतों के दबाव में डीजल पर कर शून्य कर दिया गया। इसके बावजूद, पेट्रोल की कीमतें चार सौ पचासी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई हैं, जिसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।


पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति

यह घटनाक्रम यह सवाल उठाता है कि क्या पाकिस्तान अपनी क्षमता से अधिक बड़ा खेल खेलने की कोशिश कर रहा है। एक ओर वह खुद को शांति का दूत बताता है, दूसरी ओर उसकी आंतरिक कमजोरियां और असफल कूटनीतिक प्रयास उसकी साख को कमजोर कर रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि वैश्विक मंच पर दिखावा ज्यादा देर तक नहीं टिकता।