पश्चिम बंगाल में मछली का राजनीतिक महत्व: पीएम मोदी और ममता बनर्जी के बीच टकराव
मछली का सियासी सफर
पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य में मछली अब केवल थाली तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गई है। मछली न केवल बंगालियों की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है, बल्कि अब यह राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बन गई है। इस बार, मछली जैसे कतला, हिलसा, पाबदा और चिंगड़ी चुनावी मंचों पर चर्चा का विषय बन गए हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में ममता बनर्जी की सरकार पर आरोप लगाया कि राज्य मछली की आवश्यकताओं के लिए अन्य राज्यों पर निर्भर है और सरकार इस मामले में असफल रही है। उनका यह बयान एक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने मछली उत्पादन में आत्मनिर्भरता की कमी को बंगाल के विकास से जोड़ा है।
पीएम मोदी का मछली उत्पादन पर बयान
हल्दिया में एक जनसभा के दौरान, पीएम मोदी ने कहा कि टीएमसी सरकार मछली की मांग के अनुसार उत्पादन करने में असफल रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 15 वर्षों में टीएमसी ने मछली उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। मोदी ने आश्वासन दिया कि भाजपा सरकार बनने पर राज्य को मत्स्य पालन में आत्मनिर्भर बनाएगी।
ममता बनर्जी ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा शासित राज्यों में मांसाहारी भोजन पर प्रतिबंध है और उन्होंने मोदी पर तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया।
बंगाल में मछली के आयात के आंकड़े
हालांकि, बंगाल मछली का शुद्ध आयातक भी है। राज्यसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार, बंगाल स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए मॉरिटानिया और युगांडा जैसे देशों से मछली का आयात करता है। 2025-2026 में, बंगाल ने मॉरिटानिया से $5.33 मिलियन मूल्य की मछली का आयात किया।
बांग्लादेश से हिलसा मछली का आयात भी महत्वपूर्ण है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश ने हिलसा के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि, बांग्लादेश हर साल भारत को कुछ मात्रा में मछली भेजता रहा है।