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पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी: बलात्कार की कोशिश की परिभाषा पर बहस

पटना हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने बलात्कार की कोशिश की कानूनी परिभाषा पर नई बहस को जन्म दिया है। अदालत ने कहा कि महिला के ब्रेस्ट दबाना और सलवार उतारने का प्रयास बलात्कार की कोशिश नहीं माना जाएगा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए जजों को संवेदनशीलता और शोध करने की सलाह दी। इस मामले में आरोपी को बरी किया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की गंभीरता पर सवाल उठाए हैं। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ।
 

महिला के साथ हुई घटना पर हाईकोर्ट का फैसला

पटना हाईकोर्ट के हालिया निर्णय ने बलात्कार की कोशिश की कानूनी परिभाषा पर एक नई बहस को जन्म दिया है। अदालत ने कहा कि किसी महिला को कमरे में बंद करना, उसके ब्रेस्ट दबाना और सलवार उतारने का प्रयास करना आईपीसी की धारा 376/51 के तहत बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। जब तक यह साबित न हो जाए कि आरोपी ने बलात्कार करने के लिए स्पष्ट और प्रत्यक्ष कदम उठाए थे। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी का व्यवहार गंभीर था और यह महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला था, जो आईपीसी की धारा 354 के अंतर्गत आता है। 9 जुलाई को इस मामले में बांका के हिमांशु उर्फ मिथिया पाठक को बरी कर दिया गया। इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है।


सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया

सीजेआई की चिंता

पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्ण सिंह ने 9 जुलाई 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि इस मामले में कोई मेडिकल सबूत नहीं है और बलात्कार की कोशिश के लिए स्पष्ट शारीरिक प्रयास का प्रमाण भी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि जजों को संवेदनशील होना चाहिए और निर्णय लेने से पहले उचित शोध करना चाहिए। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश से संबंधित थी।


आरोपी पर लगे आरोप

घटना का विवरण

20 जनवरी 2008 को बांका जिले के अमरपुर में 'छाया स्टूडियो' में हुई घटना के संबंध में FIR दर्ज की गई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि स्टूडियो के मालिक पाठक ने पीड़िता को अंदर बुलाया और उसके पिता को बाहर इंतज़ार करने के लिए कहा। इसके बाद आरोपी ने दरवाज़ा बंद कर लिया। पीड़िता ने बताया कि आरोपी ने उसके कपड़े उतारे और बलात्कार की कोशिश की। 2013 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराया और उसे तीन साल की सजा सुनाई। हालांकि, हाईकोर्ट ने प्रक्रिया में कमियों के चलते आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि पेनिट्रेशन का कोई सबूत न हो, तो बलात्कार की कोशिश का मामला नहीं बनता।