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न्यायपालिका की छवि पर उठे सवाल: एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक में विवाद

हाल ही में एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों का उल्लेख किया गया, जिसमें भ्रष्टाचार और लंबित मुकदमों की संख्या शामिल है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने गंभीर आपत्ति जताई है, और इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश बताया। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी इस मुद्दे को उठाया है, यह कहते हुए कि बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाना अनुचित है। इस विवाद ने न्यायपालिका की छवि और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।
 

न्यायिक प्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

देश की न्यायिक प्रणाली को लेकर एक महत्वपूर्ण विवाद तब उत्पन्न हुआ जब एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के समक्ष मौजूद चुनौतियों के रूप में भ्रष्टाचार, लंबित मामलों की अधिकता और न्यायाधीशों की कमी का उल्लेख किया गया। इस पर उच्चतम न्यायालय ने गंभीर आपत्ति जताते हुए स्वतः संज्ञान लिया और कहा कि न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।


मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई में पीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश बताया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 'मैं किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा। कानून अपना काम करेगा।' उन्होंने आगे कहा कि यह एक सोचा-समझा कदम प्रतीत होता है। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी इसे संविधान की मूल संरचना के खिलाफ बताया।


वरिष्ठ अधिवक्ताओं की आपत्ति

वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने इस मुद्दे को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उठाया। उनका कहना था कि जब जनता का न्यायपालिका पर भरोसा है, तब बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाना अनुचित है। उन्होंने यह भी कहा कि पाठ्यपुस्तक में अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का उल्लेख नहीं है, केवल न्यायपालिका को निशाना बनाया गया है।


पुस्तक में विवादित अध्याय

विवादित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। पहले के संस्करणों में न्यायालयों की संरचना और कार्यप्रणाली पर ध्यान केंद्रित किया गया था, जबकि नए संस्करण में व्यवस्था की चुनौतियों पर चर्चा की गई है। 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' शीर्षक खंड में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लोग भ्रष्टाचार का सामना कर सकते हैं, जिससे गरीबों के लिए न्याय तक पहुंच कठिन हो सकती है।


लंबित मुकदमों की स्थिति

पुस्तक में लंबित मुकदमों के आंकड़े भी दिए गए हैं। इसमें बताया गया है कि उच्चतम न्यायालय में लगभग 81 हजार मामले लंबित हैं, उच्च न्यायालयों में लगभग 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में करीब 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं। ये आंकड़े न्याय प्रणाली पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं।


न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा

नयी पुस्तक के 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' खंड में कहा गया है कि न्यायाधीश एक आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है। इसमें भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का कथन भी शामिल है, जिसमें उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार जन विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है, लेकिन त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई से इसे पुनः स्थापित किया जा सकता है।


सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि उसे देश भर से फोन आ रहे हैं और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के चयनात्मक उल्लेख को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। पीठ ने संकेत दिया कि इस विषय पर विस्तृत सुनवाई की जाएगी। यह विवाद कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सवाल उठाता है कि क्या छात्रों को लोकतांत्रिक संस्थाओं की चुनौतियों से अवगत कराना पारदर्शिता का हिस्सा है या इससे संस्थाओं की छवि प्रभावित होती है।