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नेहरू का मिक्स्ड इकोनॉमी मॉडल और भारत की कूटनीति

इस लेख में, हम पंडित नेहरू के मिक्स्ड इकोनॉमी मॉडल और भारत की कूटनीति के विकास पर चर्चा करेंगे। जानें कि कैसे नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद के भारत को एक नई दिशा दी और कैसे उन्होंने आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर कदम बढ़ाया। बांडुंग सम्मेलन से लेकर सोवियत संघ के साथ संबंधों तक, यह लेख नेहरू के दृष्टिकोण और उनके द्वारा स्थापित नीतियों की गहराई में जाएगा।
 

बांडुंग सम्मेलन की ऐतिहासिक बैठक

अप्रैल 1955 में, भारत को स्वतंत्र हुए आठ वर्ष हो चुके थे। ब्रिटिश शासन समाप्त हो चुका था, और अब हम अपने कानून बनाने और स्वतंत्रता के साथ जीने के लिए तैयार थे। इसी महीने की 18 तारीख को, इंडोनेशिया के बांडुंग में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें भारत, म्यांमार, श्रीलंका, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे देशों ने भाग लिया। इसे बांडुंग सम्मेलन के नाम से जाना जाता है। इस सम्मेलन में, श्रीलंका के प्रधानमंत्री सर जॉन कोटलेवाला ने सोवियत संघ के उपनिवेशों की तुलना एशिया और अफ्रीका के उपनिवेशों से की, जिससे नेहरू जी को गहरा आघात लगा। उन्होंने कोटलेवाला से तीखे स्वर में पूछा कि उन्होंने अपना भाषण उन्हें क्यों नहीं दिखाया। इस पर कोटलेवाला ने जवाब दिया कि उन्होंने ऐसा क्यों करना चाहिए। इस विवाद के बीच, इंदिरा गांधी ने नेहरू को शांत रहने की सलाह दी। कोटलेवाला ने अपनी किताब में लिखा कि वे और नेहरू हमेशा अच्छे दोस्त रहे हैं।


नेहरू का मिक्स्ड इकोनॉमी का चुनाव

नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद न तो पूर्ण पूंजीवाद को अपनाया और न ही साम्यवाद को। उन्होंने एक मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता चुना, जिसमें भारी उद्योगों जैसे स्टील और बिजली पर सरकारी नियंत्रण था। उपभोक्ता वस्तुओं के लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दी गई, लेकिन उन पर कड़े नियम लागू थे। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) ने इस मॉडल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नेहरू ने बड़े बांधों और इस्पात संयंत्रों को 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा और औद्योगीकरण को गरीबी दूर करने का एकमात्र उपाय माना। उन्होंने 1950 में 'योजना आयोग' की स्थापना की और पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत की।


आदर्शवाद और यथार्थवाद का संघर्ष

गुटनिरपेक्ष आंदोलन को शुरू से ही आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। आलोचकों ने इसे तटस्थता या अलगाववाद का नाम दिया। लेकिन भारत का नेतृत्व दृढ़ रहा और वे शीत युद्ध में एक सक्रिय खिलाड़ी बनना चाहते थे। 1950 के दशक में, भारत की कूटनीति सिद्धांतों पर आधारित थी, जिसने कोरियाई युद्ध में शांति स्थापित करने का प्रयास किया और कम्युनिस्ट चीन की वैश्विक मान्यता का समर्थन किया। हालांकि, 1970 का दशक यथार्थवाद की ओर एक बदलाव का प्रतीक बना। हरित क्रांति ने कृषि को बदल दिया और भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया।


सोवियत संघ के साथ संबंध

1971 में सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि पर हस्ताक्षर एक महत्वपूर्ण कदम था। यह भू-राजनीतिक उथल-पुथल का एक सोची-समझी प्रतिक्रिया थी। अमेरिका के चीन के करीब आने और पूर्वी पाकिस्तान में घटनाओं ने भारत में शरणार्थियों की आमद को बढ़ावा दिया। तटस्थता अब इन संकटों का समाधान नहीं कर सकती थी। सोवियत संघ का समर्थन भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ, जिसने 1971 के युद्ध में जीत दिलाने में मदद की।


नेहरू का समाजवाद

नेहरू का समाजवाद केवल एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक गरीब देश को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश थी। उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी, जबकि दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी। आज, जब हम 1991 से पहले की भारत की धीमी विकास दर को देखते हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या नेहरू का समाजवाद भारत के लिए सुरक्षा कवच था या यह भारतीय उद्यमिता को दशकों तक रोकने वाली बेड़ियाँ थीं?