नई दिल्ली में आनंदमठ उपन्यास पर गोष्ठी का आयोजन
नई दिल्ली में आयोजित एक गोष्ठी में बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंदमठ पर चर्चा की गई। साहित्यकारों ने इस कृति के महत्व और इसके राष्ट्रीय भाव को उजागर किया। वक्ताओं ने बताया कि यह उपन्यास भारतीय राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है और 'वंदे मातरम' गीत स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेरणा का स्रोत बना। इस कार्यक्रम में कई प्रमुख साहित्यकार और शोधार्थी शामिल हुए।
Feb 27, 2026, 19:49 IST
आनंदमठ उपन्यास पर चर्चा
शुक्रवार को, अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने प्रवासी भवन, नई दिल्ली में बंकिमचंद्र चटर्जी के प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ पर एक गोष्ठी का आयोजन किया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष विनोद बब्बर ने की। संचालन का कार्य दक्षिणी विभाग की अध्यक्ष सारिका कालरा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन अखिल भारतीय साहित्य परिषद के केंद्रीय कार्यालय मंत्री संजीव सिन्हा ने प्रस्तुत किया।
गोष्ठी में अपने विचार साझा करते हुए, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री मनोज कुमार ने कहा कि आनंदमठ ने भारत माता के सगुण रूप को स्थापित किया और 'भारत माता की जय' का उद्घोष किया। इस उपन्यास में एक अच्छे नागरिक बनने को परम कर्तव्य बताया गया है, साथ ही इसमें प्रकृति, शृंगार और सौंदर्य का गहन वर्णन किया गया है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विनोद बब्बर ने कहा कि आनंदमठ एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति है। इस पर कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन और गहराई से चिंतन की आवश्यकता है। इसमें वाल्मीकी रामायण से प्रेरणा लेकर जन्मभूमि की रक्षा को पवित्र कर्तव्य बताया गया है। बंकिमचंद्र चटर्जी ने इस उपन्यास में राष्ट्रभाव को प्रमुखता दी है।
गोष्ठी में राकेश कुमार, वरुण कुमार, प्रिया वरुण कुमार, सुरेन्द्र अरोड़ा, सुनीता बुग्गा, बबीता किरण, मंजुल शर्मा, वेद प्रकाश मिश्र, मनोज शर्मा और ममता वालिया ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि बंकिमचंद्र चटर्जी का उपन्यास आनंदमठ एक ऐतिहासिक साहित्यिक कृति है। यह 18वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह और बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जो राष्ट्र को देवी और मां के रूप में प्रतिष्ठित करता है। आनंदमठ भारतीय राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया है। इस उपन्यास में संगृहीत गीत 'वंदे मातरम' स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। उपन्यास के पात्र अपनी मातृभूमि की मुक्ति के लिए पारिवारिक सुख और संपत्ति का त्याग कर राष्ट्र सेवा को परम धर्म मानते हैं।
इस अवसर पर अ.भा. संयुक्त महामंत्री नीलम राठी, साहित्य परिक्रमा पत्रिका के प्रबंधक रजनी मान, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के संयुक्त महामंत्री बृजेश गर्ग सहित कई साहित्यकार, शोधार्थी और पाठक उपस्थित रहे।