दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: महिलाओं पर भी गैंगरेप का आरोप संभव
दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने गैंगरेप से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामले में यह स्पष्ट किया है कि महिलाओं पर भी सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया जा सकता है, भले ही उन्होंने स्वयं इस अपराध को अंजाम न दिया हो। अदालत ने कहा कि यदि कोई महिला साझा मंशा के तहत अपराध में शामिल होती है या इसमें सहायता करती है, तो उसके खिलाफ गैंगरेप से जुड़े कानूनी प्रावधानों के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं। यह निर्णय आपराधिक कानून में सामूहिक जिम्मेदारी और विभिन्न व्यक्तियों की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अदालत का बयान
जस्टिस अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने 15 अक्टूबर 2026 को दिए गए फैसले में कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 70 में 'व्यक्ति' शब्द केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि गैंगरेप के मामलों में यह आवश्यक नहीं है कि समूह में शामिल हर व्यक्ति ने स्वयं दुष्कर्म किया हो। यदि किसी व्यक्ति की भूमिका साझा मंशा के तहत अपराध को संभव बनाने या उसमें सहयोग करने की रही है, तो उसके खिलाफ भी आरोप लगाए जा सकते हैं।
मामले का विवरण
यह मामला एक महिला की याचिका से संबंधित है, जिसने निचली अदालत द्वारा उसके खिलाफ आरोप तय करने के आदेश को चुनौती दी थी। आरोप था कि महिला ने अपनी नाबालिग बेटी पर दबाव डालकर उसे दूसरे आरोपी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। अभियोजन पक्ष ने मामले में दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच की घटनाओं का उल्लेख किया।
इस मामले में जुलाई 2024 में दिल्ली के भलस्वा डेयरी पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया गया था। निचली अदालत ने महिला के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 70 और पॉक्सो कानून के तहत आरोप तय किए थे। महिला ने इन आरोपों को चुनौती देते हुए कहा कि कानून में दुष्कर्म की परिभाषा में केवल पुरुष का उल्लेख है, इसलिए उस पर गैंगरेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
महिला की दलील का खंडन
हाईकोर्ट ने महिला की दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि गैंगरेप से संबंधित कानून को केवल इस आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता कि आरोपी महिला है या पुरुष। अदालत के अनुसार, इस अपराध में समूह की साझा मंशा और संबंधित व्यक्ति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति कथित अपराध को अंजाम देने में साझा मंशा के तहत सहयोग करता है, तो केवल शारीरिक रूप से अपराध न करने के आधार पर उसे आरोपों से बाहर नहीं रखा जा सकता।
BNS की धारा 70 का महत्व
भारतीय न्याय संहिता की धारा 70 सामूहिक दुष्कर्म से संबंधित है। इस प्रावधान के तहत, जब एक समूह के लोग साझा मंशा से अपराध में शामिल होते हैं, तो परिस्थितियों और कानून की शर्तों के अनुसार समूह के प्रत्येक व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय की जा सकती है। अदालत ने इसी कानूनी सिद्धांत के आधार पर कहा कि इस धारा में 'व्यक्ति' शब्द का अर्थ केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है।
महिला की अकेले गैंगरेप की जिम्मेदारी
अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी महिला पर गैंगरेप का आरोप लगाया जा सकता है, यदि वह समूह के साथ साझा मंशा के तहत अपराध में शामिल हो। कोर्ट ने यह निर्णय नहीं दिया कि कोई महिला अकेले दुष्कर्म का अपराध कर सकती है या नहीं। भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 और भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में दुष्कर्म की परिभाषा के तहत इस्तेमाल शब्दों की व्यापक व्याख्या पर भी अदालत ने कोई अंतिम राय नहीं दी।
निचली अदालत का आदेश बरकरार
दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत के 17 जनवरी 2025 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हुआ कि गैंगरेप के मामले में किसी महिला की आपराधिक जिम्मेदारी तय करते समय उसकी भूमिका और साझा मंशा पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, आरोप तय होना दोष सिद्ध होना नहीं है। मामले में आरोपों की सच्चाई और आरोपी की जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण ट्रायल और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय सामूहिक अपराधों में कानूनी जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि गैंगरेप के मामले में आरोपी का लिंग उसे आरोपों से बाहर रखने का आधार नहीं हो सकता। किसी भी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित कानून, आरोपों और साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा।