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दिल्ली हाई कोर्ट ने संसद की सुरक्षा पर जनहित याचिका खारिज की

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें संसद की सुरक्षा और उसके कार्यों की समीक्षा की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से सरकार और संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। चीफ जस्टिस ने यह भी बताया कि जन-सुरक्षा से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इस निर्णय ने सुरक्षा तंत्र की समीक्षा की आवश्यकता पर सवाल उठाए हैं।
 

दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय

दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से मना कर दिया। इस याचिका में भारत की संसद की सुरक्षा, संरक्षा, और संवैधानिक कार्यों के संचालन के लिए मौजूदा संस्थागत ढांचे की गहन समीक्षा की मांग की गई थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों का अधिकार क्षेत्र पूरी तरह से सरकार और संसद के अंतर्गत आता है। याचिका को अस्वीकार करते हुए, चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने कहा कि संसद की सुरक्षा का दायित्व सरकार का है और न्यायालय संसद को उसके सुरक्षा ढांचे की समय-समय पर समीक्षा करने का निर्देश नहीं दे सकता। उन्होंने कहा कि यह संसद का कार्य है कि वह समय-समय पर इसकी समीक्षा करे।


याचिका में उठाए गए मुद्दे

इस जनहित याचिका में केंद्र सरकार से अनुरोध किया गया था कि वह सुरक्षा से संबंधित बदलती चुनौतियों के मद्देनजर संसद के प्रशासनिक, संस्थागत, और तकनीकी सुरक्षा तंत्र की व्यापक समीक्षा करे। याचिकाकर्ता ने अधिकारियों से यह भी अनुरोध किया था कि वे उनके द्वारा तैयार किए गए एक कॉन्सेप्ट नोट की जांच करें, जिसका शीर्षक था "भारत की संसद (सुरक्षा, पवित्रता और संरक्षण) अधिनियम, 2026 की प्रस्तावित रूपरेखा।" सुनवाई के दौरान, पीठ ने याचिका के स्वीकार्यता पर सवाल उठाए।


चीफ जस्टिस की टिप्पणी

चीफ जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि अदालत को इन मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि केवल संसद ही नहीं, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे भी हैं जो जन-सुरक्षा से जुड़े हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि क्या रेलवे स्टेशनों पर भगदड़ नहीं होती? क्या एयरपोर्ट पर सुरक्षा से संबंधित समस्याएं नहीं हैं? क्या पैदल चलने वालों की सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा जाता?