दिल्ली में इच्छामृत्यु पर महत्वपूर्ण बहस के बीच हरीश राणा का अंतिम संस्कार
दिल्ली में हरीश राणा का अंतिम संस्कार हुआ, जो निष्क्रिय इच्छामृत्यु के पहले मामले में शामिल थे। उनकी कहानी ने जीवन, सम्मान और चिकित्सा नैतिकता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। परिवार ने एक दशक से अधिक समय तक उनकी देखभाल की, जबकि समाज में इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई है। जानें उनके जीवन की संघर्षपूर्ण कहानी और इस मामले के पीछे के भावनात्मक पहलू।
Mar 25, 2026, 11:57 IST
दिल्ली में हरीश राणा का अंतिम संस्कार
दिल्ली में एक ऐसी घटना का समापन हुआ जिसने जीवन, सम्मान और चिकित्सा नैतिकता पर गंभीर प्रश्न उठाए। हरीश राणा का अंतिम संस्कार आज दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट में किया गया। यह मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि हरीश राणा देश के पहले व्यक्ति थे जिन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मिली थी। जानकारी के अनुसार, हरीश राणा ने मंगलवार को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली में अंतिम सांस ली। वह पिछले तेरह वर्षों से कोमा में थे। 2013 में पंजाब विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान चौथी मंजिल से गिरने के बाद उनकी स्थिति गंभीर हो गई थी। डॉक्टरों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उनकी हालत में सुधार की कोई संभावना नहीं है और वह स्थायी वनस्पतिक अवस्था में चले गए हैं।
इस मामले ने तब नया मोड़ लिया जब इस महीने भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उनके जीवन रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि फीडिंग ट्यूब जैसे चिकित्सकीय सहारे हटाए जा सकते हैं, लेकिन उन्हें आराम और दर्द से राहत देने वाली देखभाल जारी रहनी चाहिए ताकि उनकी मृत्यु प्राकृतिक और सम्मानजनक तरीके से हो सके। यह निर्णय भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के सीमित लेकिन महत्वपूर्ण उपयोग का एक दुर्लभ उदाहरण बन गया।
मृत्यु से कुछ दिन पहले, हरीश राणा को गाजियाबाद स्थित उनके घर से दिल्ली के एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में स्थानांतरित किया गया था। यहां उन्हें विशेष देखभाल दी गई ताकि उनके अंतिम समय में किसी प्रकार का कष्ट न हो। उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार में परिवार के सदस्य और आध्यात्मिक संगठन के स्वयंसेवक उपस्थित रहे।
हरीश राणा के परिवार की कहानी भी उतनी ही भावुक और संघर्षपूर्ण रही है। उनके माता-पिता, अशोक राणा और निर्मला देवी ने पिछले एक दशक से अधिक समय तक उनकी देखभाल की। इस दौरान उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पड़ोसियों के अनुसार, बेटे के इलाज के लिए परिवार को अपना घर तक बेचना पड़ा। यह त्याग और समर्पण की एक ऐसी मिसाल है जिसने आसपास के लोगों को भी भावुक कर दिया।
पड़ोस में रहने वाले लोगों ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया। एक निवासी ने कहा कि परिवार ने हर संभव प्रयास किया और इतने वर्षों तक उम्मीद नहीं छोड़ी। हरीश राणा के अंतिम दिनों में आध्यात्मिक सहयोग भी देखने को मिला। ब्रह्मा कुमारी संस्था के सदस्य उनके घर पहुंचे और प्रार्थना की। एक वीडियो में उन्हें शांतिपूर्वक विश्राम करने के लिए प्रेरित करते हुए देखा गया। यह दृश्य इस बात को दर्शाता है कि चिकित्सा के साथ-साथ आध्यात्मिक समर्थन भी ऐसे कठिन समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह पूरा मामला भारत में इच्छामृत्यु, चिकित्सा निर्णय और मानव गरिमा पर एक महत्वपूर्ण बहस को फिर से सामने लाता है। हरीश राणा की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन अनगिनत परिवारों की भी है जो लंबे समय तक गंभीर बीमारियों से जूझते हैं। उनके जीवन और मृत्यु ने यह सवाल छोड़ दिया है कि आखिर सम्मानजनक जीवन और सम्मानजनक मृत्यु के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। हरीश राणा का जाना एक शांत अंत जरूर है, लेकिन उनके पीछे छोड़ गए सवाल लंबे समय तक समाज और न्याय व्यवस्था को सोचने पर मजबूर करते रहेंगे।
अंतिम संस्कार में उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय भी शामिल हुए। उन्होंने कहा कि यह बेहद दुखद मामला है और हम सभी इस परिवार के साथ हैं।