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दिल्ली उच्च न्यायालय ने धन शोधन मामले में ईडी से मांगा जवाब

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 'रहेजा डेवलपर्स' के चेयरमैन के बेटे नयन रहेजा की याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय से जवाब मांगा है। याचिका में 2022 के धन शोधन मामले को रद्द करने की मांग की गई है, जिसमें 4,600 घर खरीदारों को फ्लैट की आपूर्ति में देरी का आरोप है। न्यायालय ने ईडी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और मामले की सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी। याचिकाकर्ता ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं।
 

दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने धन शोधन के एक मामले में 'रहेजा डेवलपर्स' के चेयरमैन के बेटे नयन रहेजा द्वारा दायर याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से अपना पक्ष प्रस्तुत करने को कहा है। इस याचिका में रहेजा ने 2022 के उस धन शोधन मामले को रद्द करने की मांग की है, जिसमें लगभग 4,600 घर खरीदारों को फ्लैट की आपूर्ति में देरी का आरोप है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने ईडी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा, "वे निर्देश प्राप्त करें और स्थिति रिपोर्ट दाखिल करें।"


न्यायाधीश ने 30 जुलाई को दिए गए आदेश में याचिकाकर्ता के इस आश्वासन को भी रिकॉर्ड में शामिल किया कि वह ईडी के साथ पूर्ण सहयोग करेंगे।


मामले की सुनवाई की तारीख

इस मामले की सुनवाई 15 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। आरोप है कि रहेजा डेवलपर्स लिमिटेड ने 4,600 घर खरीदारों से 2699.13 करोड़ रुपये जुटाए, लेकिन इनमें से 1353.26 करोड़ रुपये का उपयोग निर्माण कार्य के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए किया गया। याचिकाकर्ता पर यह भी आरोप है कि उन्हें अपराध से अर्जित धन में से 1.23 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।


याचिकाकर्ता की दलील

अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने पेशी दी। याचिकाकर्ता, जो पेशे से वास्तुकार हैं, ने तर्क किया कि उनके खिलाफ किसी भी निर्धारित अपराध या आपराधिक इरादे के अभाव में कार्यवाही को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।


कानूनी फर्म का तर्क

कानूनी फर्म करंजावाला एंड कंपनी द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता को ईसीआईआर में आरोपी बनाया गया है, जबकि तीन में से दो मूल प्राथमिकी में पुलिस ने उन्हें पहले ही आरोप मुक्त कर दिया है। इसके अलावा, आरोपपत्र में उनका नाम शामिल किए बिना ही मामला दर्ज किया गया है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि तीसरी प्राथमिकी में शिकायतकर्ता पक्ष के साथ समझौता हो चुका है।