दलाई लामा का 91वां जन्मदिन: तिब्बत के आध्यात्मिक नेता की यात्रा
दलाई लामा, जो आज 91 वर्ष के हो गए हैं, ने तिब्बत के लोगों के अधिकारों के लिए पिछले 60 वर्षों से संघर्ष किया है। उनका जन्म 1935 में हुआ था और उन्होंने 1950 में तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद भारत में शरण ली। दलाई लामा ने तिब्बत के मुद्दों को वैश्विक स्तर पर उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके जीवन की यात्रा और संघर्षों के बारे में जानें, जो उन्हें आज के दिन तक ले आए हैं।
Jul 6, 2026, 11:28 IST
दलाई लामा का जन्मदिन
बौद्ध धर्म के प्रमुख दलाई लामा आज, 6 जुलाई को अपने 91वें जन्मदिन का जश्न मना रहे हैं। हालांकि वह खुद को एक साधारण भिक्षु मानते हैं, लेकिन पिछले 60 वर्षों से अधिक समय से उन्होंने तिब्बत के लोगों और उनके अधिकारों के लिए निरंतर प्रयास किए हैं। उन्होंने अपने समुदाय के मुद्दों को वैश्विक स्तर पर उजागर करने में सफलता प्राप्त की है। दलाई लामा का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से भारत रहा है। आइए, उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प जानकारियों पर नजर डालते हैं...
जन्म और परिवार
14वें दलाई लामा, जिनका असली नाम ल्हामो धोंदुप है, का जन्म 6 जुलाई 1935 को चीन के किंघई प्रांत में एक किसान परिवार में हुआ था। केवल 2 वर्ष की आयु में, एक खोज दल ने उन्हें तिब्बत के आध्यात्मिक और लौकिक नेता के 14वें अवतार के रूप में पहचाना।
तिब्बत छोड़ने का कारण
चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया, जिसे उसने 'शांतिपूर्ण मुक्ति' का नाम दिया। किशोर दलाई लामा ने इसके बाद राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया। उन्होंने माओत्से तुंग और अन्य चीनी नेताओं से मिलने के लिए बीजिंग की यात्रा की। लेकिन 9 साल बाद, यह डर बढ़ गया कि उनका अपहरण किया जा सकता है, जिसके चलते तिब्बत में एक बड़ा विद्रोह भड़क गया। चीनी सेना ने विद्रोह को दबाने के लिए अत्याचार किए।
भारत में स्वागत
10 मार्च 1959 को, 23 वर्षीय दलाई लामा को चीनी जनरल ने डांस परफॉर्मेंस के लिए आमंत्रित किया, लेकिन बिना किसी सुरक्षा के। इससे तिब्बती लोग चिंतित हो गए कि उनका आध्यात्मिक नेता अपहरण का शिकार हो सकता है। प्रदर्शन के दिन, हजारों तिब्बती उनके महल के बाहर इकट्ठा होकर विरोध करने लगे, साथ ही यह अफवाह भी फैली कि चीनी सेना महल पर हमला कर सकती है।
भारत में शरण
17 मार्च 1959 की रात, दलाई लामा ने सैनिक के वेश में अपने परिवार और कुछ अधिकारियों के साथ महल से भाग निकले। उन्होंने पहले ही ल्हासा में भारतीय वाणिज्य दूत से भारत में शरण की मांग की थी। भारत ने उन्हें खुले दिल से स्वीकार किया, क्योंकि उसने तिब्बत को हमेशा एक स्वतंत्र देश माना है और उसके साथ मजबूत सांस्कृतिक और वाणिज्यिक संबंध बनाए रखे हैं।
दलाई लामा की राजनीतिक भूमिका
हालांकि, पहले सीमा शांतिपूर्ण रही, लेकिन 1954 में भारत ने चीन के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे तिब्बत को 'चीन के तिब्बत क्षेत्र' के रूप में स्वीकार किया गया। भारत ने दलाई लामा की सुरक्षा का ध्यान रखा और उन्हें कुछ समय के लिए अरुणाचल प्रदेश के तवांग मठ में ठहराया। फिर, 3 अप्रैल 1959 को, पंडित नेहरू से मुलाकात के बाद उन्हें स्थायी शरण दी गई।
धर्मशाला में स्थायी निवास
हिमाचल प्रदेश का धर्मशाला पहले से ही उन हजारों तिब्बतियों के लिए घर बन चुका था, जो चीनी दमन से भाग रहे थे। बाद में, दलाई लामा भी वहां स्थायी रूप से बस गए और निर्वासित तिब्बती सरकार की स्थापना की। हालांकि, भारत के इस कदम से चीन नाराज हो गया।
राजनीतिक भूमिका का त्याग
2011 में, दलाई लामा ने घोषणा की कि वह अपनी राजनीतिक भूमिका से हट जाएंगे और निर्वासित तिब्बती सरकार के एक निर्वाचित नेता को सभी जिम्मेदारियां सौंप देंगे। फिर भी, वह अभी भी सक्रिय हैं।